Saturday, January 9, 2010

पत्रकारों को जूतियाने का सही समय...

अलग-अलग अखबारों में मुंबई के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को लेकर खबरें थीं। सभी खबरों का मजमूनं एक सा था लेकिन आप एक खबर की शुरूआत देख लीजिये
"जो दशा देश में बाघों की उसी दशा में मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट भी पहुंच गये है। सारे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आज या तो जेल में है अथवा नौकरी से निलंबित -निष्कासित है।"
खबर का मतलब है कि बाघ और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दोनों पूरी तरह से नहीं तो ज्यादातर एक जैसे है। लेकिन पिछले दस सालों के पत्रकारिता के कैरियर में मैंने कभी नहीं सुना कि किसी बाघ को फर्जी एनकाउंटर के चलते जेल भेजा गया हो या किसी नौकरी से निलंबित कर दिया गया हो। बाघ बेचारे जंगल में रहते है। देश में रहने वाले शिकारियों ने इस खूबसूरत जानवर का बेदर्दी से शिकार किया और दुनिया भर में बाघों का अस्तित्व खतरे में आ गया। हिंदुस्तान के जंगलों में 1900 की शुरूआती दशक में पचास हजार की तादाद में बाघ थे लेकिन अब उनकी संख्या दो हजार से भी कम रह गयी है। खैर बाघों की कहानी तो फिर कभी सही लेकिन पत्रकारों की एक फौज के कारनामें पर आज बात की जा सकती है।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ये शब्द ऐसे पत्रकारों की देन है जो नौकरी की तलाश में कही भी कुछ भी कर सकते थे लेकिन उनको पत्रकारिता में जगह मिल गयी और उन्होंने हाथ धो लिये। किसी को मालूम नहीं कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट होने की परीक्षा कब पास की गयी थी और कौन सी मिनिस्ट्री ने इस एक्जाम को लिया था। चलिये आपने शुरू भी कर दिया लिखना तो ठीक है लेकिन इन एनकाउंटर करने वालों को देश का हीरो बना कर रख दिया। एक ऐसा हीरों जो जिसकी हर गलती आपने उसकी अदा में बदल दी। मुंबई के इन हीरों ही नहीं देश के दूसरे वर्दी में छिपे हत्यारों से लंबी मुलाकात और बातें हुयी है। कही से नहीं लगा कि ये एनकाउंटर उन्होंने देश के प्रति अपने जज्बे के चलते किये है। हर बात का निचोड़ था कि मीडिया के एक खास वर्ग की तारीफ और अपने लिये मैडल प्रसिद्धी हासिल करने के लिये ज्यादातर एनकाउंटर किये गये। एनकाउंटर करने वाले पुलिसवालों को सबसे पहले ये कहा गया कि ये अपनी जान को दांव पर लगाते है औऱ फिर कहा गया कि इन लोगों ने अपराधियों से आम आदमी को निजात दिलाने के लिये अपने कंधों पर ये जिम्मेदारी ली है।
अगर किसी भी पुलिस वाले के एनकाउंटर को सही मायने पर किसी न्यूट्रल एजेंसी से जांच करा ली जाये तो शायद किसी को भी हैरानी नहीं होंगी कि ज्यादातर एनकाउंटर उठा कर किये गये। हमेशा एनकाउंटर के लिये अपराधियों का एक साथी मारा जाता है और दुसरे या दूसरा अंधेंरे का लाभ उठा कर भाग जाता है। लेकिन आज एनकाउंटर पर नहीं उऩ पत्रकारों पर बात कर रहे है जिनकी मदद से ये क्रिमीनल दिमाग के पुलिस वाले देश के लिये नासूर में तब्दील हो गये। शुरू में तो बड़े अपराधी के मारे जाने पर पुलिस पर निगाह रखने की जिम्मेदारी संभालने वाले पत्रकारों ने तारीफ के बंडल बांध दिये और इस बात को नजरअंदाज किया कि कैसे उस अपराधी उठा कर मारा गया। इसके लिये देश के उसी संविधान और उसकी मान्यताओं को ताक पर रख दिया गया जिसने इन पुलिस वालों को वर्दी दी थी। फिर एक दो साल में ही इऩ पुलिस वालों के रिश्ते अंडरवर्ल्ड और अपराधियों से सुर्खियों में आने लगे तो फिर पत्रकारों की उसी जमात ने इस बात का हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि बदमाशों या फिर अंडरवर्ल्ड की हरकतों पर नजर रखने के लिये इनके साथ मिलना-जुलना जरूरी है। और उनका वो दोष भी ढांप दिया गया। लेकिन आदमखोर के मुंह तो खून लग चुका था। और पुलिस वर्दी में छिपे बैठे इन अपराधियों ने शुरू कर दी वसूली और अवैध कब्जें तो फिर पत्रकारों ने कहना शुरू किया कि सरकार से मिलने वाले पैसे से तो इऩ सुपरस्टार पुलिसवालों का घर का खर्चा नहीं चलता तो मुखबिरों का नेटवर्क कैसे काम करेंगा। यानि पुलिस के अपराधी दिमाग ताकत पाते रहे और देश के कानून के दम पर वर्दी की शान रखने वाले पुलिसवाले बेबस और चुपचाप अपराधियों औऱ पुलिस का अंतर खत्म होते देखते रहे। लेकिन इस पूरे वाकये में सबसे गंदा और घटिया रोल था तो इन लोगों को हीरो बनाने वाले पत्रकारों का। मैं ऐसे पत्रकारों का नाम लूं उससे बेहतर है आप खुद खबरों को देख कर अंदाज लगा सकते है कि कौन-कौन पत्रकार किस भावना से खबर लिख रहा है। अंडरवर्ल्ड के बारे में मिलने वाली छोटी-छोटी खबर के लिये इन पुलिस वालों को महान बनाने वाले पत्रकारों की एक लंबी सूची है। दरअसल फर्जी मुठभेड़ एक ऐसी घटना होती है जो सबके लिये फायदे का सौदा होती है, किसी दूसरे गैंग से पैसे लेकर बदमाश को उड़ा देने वाले पुलिस वाले के लिये हीरो गर्दी का लाईसेंस औऱ पैसे दोनों का फायदा। इस घटना से आला अधिकारियों को आम जनता से पड़ने वाले दबाव में कमी और इस गठजोड़ में शामिल होने वाले पत्रकारों के लिये सबसे पहले मिलने वाली ब्रेकिंग न्यूज से मिली वाहवाही का फायदा। और पत्रकारों के इसी लालच ने देश की पुलिस में ऐसे सैकड़ों तथाकथित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट खड़े कर दिये जिनके लिये देश के कानून का मतलब कायरों की प्रार्थना में तब्दील हो गया। इस बात का सबूत मिल सकता है अगर देश के सभी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माने जाने वाले पुलिसवालों की संपत्ति की जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से करा ली जाये तो दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा।
जाने वो कैसी सरकारी जांच है जो हजारों करोड़ के मालिक में तब्दील हो चुके दया नायक के खिलाफ सबूत नहीं जुटा पाती और वो फिल्मों में नायक के तौर पर पूजा जाता है। प्रदीप शर्मा जो देश के सबसे बड़े दुश्मन दाउद इब्राहिम के टुच्चे से गुंडे में तब्दील हो जाता है। ऐसे ही सैकड़ों पुलिसवाले सिर्फ और सिर्फ पैसे के लिये काम करते है। और पत्रकार सिर्फ उसकी तारीफ करते है।

अरे ये प्रधानमंत्री को नहीं जानते,दिल्ली में रहकर भी

सेवन रेसकोर्स रोड़ और कनॉट प्लेस के बीच कितनी दूरी है। सवाल दिल्ली से बाहर रहने वाले लोगों के लिये अटपटा जरूर हो सकता है।लेकिन जो दिल्ली में रहते है वो जानते है कि पत्थर फेंक दे तो इन दोनों के बीच की दूरी पार की जा सकती है। लेकिन इस दूरी को पार करने में देश के प्रधानमंत्री को शायद इतना अंतर लग रहा है जितना अर्सा हमारे वैज्ञानिकों को चांद पर जाने में नहीं लगता। कैसे ....ये मैं आप को सुझा सकता हूं। देश के प्रधानमंत्री का आवास है सात रेसकोर्स रोड़। प्रधानमंत्री के आवास के सामने यानि रेसकोर्स रोड़ के आप-पास से भी आप गुजरते हो तो आप को मालूम होता है कि ये देश के सबसे ताकतवर आदमी का आवास है औऱ तब आप और भी सजग हो जायेंगे जब ये पता चलेगा कि आपके प्रधानमंत्री वर्ल्ड बैंक की नौकरी के दौरान विदेश में रह चुके है। अब प्रधानमंत्री विदेश में पढ़े लिखे और नौकरीशुदा है तो जीनियस तो होंगे ही आम फहम बात है हमारे देश के लिये क्योंकि विदेशी अपना नौकर पढ़े लिखे औऱ समझदार काले हिंदुस्तानियों को ही रखते है।
अब आप कनॉट प्लेस के चमचमाते गोल चक्करों पर नजर दौड़ाये सरकार के खर्चे पर आजकल पूरा कनॉट प्लेस को चमकाया जा रहा है यानि दुकाने और उनका फायदा दुकानदारों और उनकी चमकदमक का इंतजाम देश का। आखिरकार दुनिया में देश की इज्जत का मामला है। लेकिन इसी कनॉट प्लेस के गलियारों में खुली सड़कों पर एक दो. दस या सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की तादाद में नशे में डूबे. जिंदगी से चिपटे हुये लोगों के पॉलीथीन या दूसरे कूडे़ को बीनते हुये लोग दिखायी देंगे। इन लोगों को सरे-राह आप हाथ में रूमाल लेकर मुंह में सांस खींचतें या फिर एक चमकीली सी फॉयल को जला कर पीते हुये देख सकते है। इनके साथ औरते-बच्चे सभी होते है। और ये झुंड के झुंड कभी कूड़ा बीनते है और कभी-कभी किसी गाड़ी के सामने हाथ फैलाते हुये दिखायी दे जाते है।
ये तादाद लगातार बढ़ती दिख रही हैजाते है। सड़क से गुजरने वाला हर आदमी इन लोगों से नफरत करता है और शायद ही मैंने कभी भीख देते हुये देखा है।
लेकिन बात प्रधानमंत्री की हो रही है। देश के बाहर भी मनमोहन सिंह को इतने लोग इज्जत देते है औऱ मानते है देश की तरक्की का एक बड़ा कारण मनमोहन सिंह की मनमोहनी आर्थिक नीतियां है। और इन्हीं नीतियों के दम पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में बताया कि देश में गरीबी कम हुई है। और प्रधानमंत्री की बात की अहमियत इस लिये भी बढ़ जाती है क्योंकि देश के कई अर्थशास्त्रियों के मुताबिक देश में गरीबों की तादाद काफी हद तक बढ़ गयी है। इसके साथ ही देश में पर व्यक्ति दाल की खपत कम हुयी है। लेकिन प्रधानमंत्री के इस बयान के इऩ अर्थशास्त्रियों के विचार में क्या बदलाव आया नहीं जानता। लेकिन मैंने सोचा कि कनॉट प्लेस में घूमने वाले इन लोगों से जानकारी करूं कि इन लोगों ने मनमोहन सिंह साहब के बयान पर कितना गौर किया। दो घंटे की कवायद में मुझ से कोई बात करने के लिये तैयार नहीं हुआ और एक दो ने पैसे के लिये बात की तो ये जानकर मुझे बहुत निराशा हुयी कि वो ये ही नहीं जानते कि मनमोहन सिंह कौन है। और दूसरी तरफ मेरी हैसियत नहीं है कि मैं मनमोहन सिंह जी से जाकर पूछूं कि क्या आप कनॉट प्लेस में रहने वाले उन लोगों को जानते है। मुझे उम्मीद है कि बेचारे प्रधानमंत्री नहीं जानते होंगे नहीं तो दिल्ली से इतनी दूर जाकर ये बताने की जरूरत नहीं थी कि देश में गरीबी कम हो गयी है वो भाषण इन्हीं लोगों के बीच दे दिये होते।

Thursday, January 7, 2010

आओं अपनी बहुएं जलाये,मीडिया से दहेज विरोधी कानून बदलवाये

सर मेरी बहन को जिंदा जला दिया। पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया। कह रही है पहले जांच करेंगे।
लेकिन हम ये खबर नहीं कर सकते।
क्यों सर क्यों कवर नहीं कर सकते।
क्योंकि हमारे चैनल में दहेज हत्या की खबरें अब कवर नहीं होती। उनमें दहेज विरोधी कानूनों का कई बार बेजा इस्तेमाल होता है।
जीं हां ये आम जवाब है जो पिछले तीन-चार सालों में दहेज की बलि पर जिंदा जला दी गयी लड़कियों के भाईयों-पिताओं या फिर रिश्तेदारों को देश के मीडिया चैनल्स के रिपोर्टर ने दिया। आपको अपने दिमाग पर जोर देने की जरूरत है ताकि आप ये याद कर सके कि विज्यूअल मीडियम पर आपने आखिरी बार दहेज के लिये जलाई गयी लड़की की खबर कब देखी थी। कब देखा था कि ससुराल की दरिंदगी ने एक मासूम की जान ली। आप को ये भी याद नहीं होगा कि देश के तथाकथित नेशनल अखबारों की सुर्खियों में आखिरी बार दहेज हत्या की खबर कब आयी थी।
लेकिन आपको ये जरूर याद होगा कि टीवी चैनलों में दयनीय दिखते कुछ लडके वाले बता रहे है कि उनकी मां-बहन को भी दहेज हत्या में लपेट लिया गया। उनके खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी गयी। पुलिस उन्हें बेजा परेशान कर रही है। और अखबारों ने तो इस बात की मुहिम ही छेड दी है कि दहेज कानूनों नें बदलाव लाया जाये। देश में इन कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है। जीं हां देश में दहेज हत्या पर बात करना फैशन से बाहर हो गया। सबको लगने लगा कि हां यार लडकी वाले अपनी लड़की की बदचलनी छिपाने के लिये दहेज मांगने का आरोप लगा देते है।
दरअसल इस देश को झूठ में रहने की आदत है। इसी लिये किसी रिपोर्टर ने इस बात को कवर करने की जरूरत महसूस नहीं की कि वो चैक करे कि हाल में रिलीज हुए दहेज हत्या के आंकड़ों में कमी नहीं बल्कि बढ़ोत्तरी का ही ट्रैंड दिखायी दे रहा है। और ये सरकारी आंकडें है जो ये साबित करते है कि दहेज के लिये इस देश में हर साल हजारों की तादाद में महिलाओं की बलि चढा़यी जा रही है।
ये वो मामले है जिनकी रिपोर्ट पुलिस ने दर्ज करने में मेहरबानी की है। इससे बड़ी तादाद है उन मामलों की जिन में लड़की वालों की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं की गयी। और उससे भी बड़ी तादाद है उनकी जिनकी मौत को चांदी के जूते के दम पर ससुराल वालों ने आत्महत्या में तब्दील करा दिया। ऐसे मामले भी कम नहीं जिनकों पंचायतों में निबटा दिया गया। जिनके लिये पैसे देकर समझौता करा दिया गया।
ये देश दुनिया की ताकत कहलाने का बड़ा शौकीन है। हर बात में अमेरिका के जूते चांटने के लिये तत्पर। अमेरिका के बाप को अपना बाप बताने की कोशिश में जुटे लोगों का देश। लेकिन हजारों की तादाद में जलाई जा रही लडकियों के लिये कोई रहम नहीं कोई संवेदना नहीं। चांद पर यान उतारना है। आस्कर जीतना है दुश्मन देश की मिसाईल नष्ट करनी है सेटेलाईट दूर से जला देने है। इतनी तरक्की के बाद भी जिन लोगों को याद है कि लड़कियां जिंदा जलाई जाती वो वाहियात लोग है। देश के गद्दार है। एक रिपोर्टर होते है नासीरुद्दीन साहब तीन या शायद चार साल पहले उन्होंने बांदा में आत्महत्या करने वाली औरतों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर एक खबर की थी। और उसमें ये पता चला था कि मरने वाली औरते के जबड़े तक टूटे हुये थे उनके शरीर पर चोट के निशान थे। लेकिन मौत का कारण आत्महत्या थी। दो साल में ऐसे मामलों की तादाद सैकड़ो में थी।
अब ऐसे में दहेज विरोधी कानून को बदलने की दलील देने वालों लोगों से मेरा एक निवेदन है कि दर्द महसूस करना है तो कम से कम अपनी एक उंगुली ही आग में थोड़ी देर झुलसा कर देख ले।
मुझे याद आ रही है मंजर साहब की दो पक्तियां। पता नहीं सही से लिख पा रहा हूं कि नहीं क्योंकि ये भी उस वक्त कि है जब मैं आठ साल का लड़का होता था और किसी भी लड़की के जलने पर घर की औरतों और अपने पिताजी को बात करते हुये देखता था।
जिन्हें शौक है बहुएं जलाने का
वो पहले अपने घर में बेटियां जला ले।

Tuesday, February 10, 2009

सच

छीनने के लिये पैसा, लूटने के लिये मकान।

नारों के लिये ईश्वर, और नेता दोनों ही सहज उपलब्ध।

मकान लूट लू या नारा लगाऊं, मैं क्या करूं,

हत्याओं के लिये आदमी, झपटने के लिये कार

हटाने के लिये नैतिक बोध , मिटाने के लिये नक्शे

तब मैं क्या करूं

बलात्कार करने के लिये लड़कियां, ठगने के लिये स्त्रियां

छलने के बुढियाएं सारी

मैं क्या करूं

। जलाने के लिये बस्तियां , लूटने के लिये बाजार।

इन सबसे भी बड़ा है व्यापार।

मैं क्या करूं

Tuesday, December 30, 2008

जन्मदिन की तारीख

किसी भी तारीख को मैं हो सकता था, वो तारीख भी दोहराई जाती हजारों लाखों बार,
लिहाजा किसी एक तारीख का तुमको याद दिलाना कुछ भी नहीं,
मैंने तुमको लाखों शब्द कहे होंगे, लेकिन एक भी ऐसा नहीं जो कहा न गया हो,
मैं तुमको जीना चाहता था इस तरह से जैसे किसी को जिया न गया हो,
लेकिन ऐसा कोई भी तरीका मैं खोज नहीं पाया।
हर बार याद आ गयी किसी और की जो इस तरह से गुजर गया।
जिंदगी भर किसी काम को करना चाहा इस तरह, जो सिर्फ मैं ही कर पाऊ
कोई और न सोच सके न कर सके।
लेकिन मैं ऐसा कुछ भी न कर पाया
जीना एक इंसान के जिस्म में सबसे मुश्किल था
और मैं इसे आसान बनने में बीत गया एक पूरा जीवन मेरा या तुम्हारा।

Friday, October 10, 2008

देश का शेयर

प्रश्न जितने बढ़ रहे,
घट रहे उतने जवाब,
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है......सर्वेश्वरदयाल सक्सेना।
अभी तक तो सिर्फ दफ्तर या फिर मीडिया की सुर्खियों में सुन रहा हूं कि शेयर बाजार डूब रहा है। बैंक डूब रहे है और दुनिया में डूब रही है बड़ी कंपनियां। मेरा किसी शेयर मार्किट से कभी कोई ताल्लुक नहीं रहा है सिर्फ एक खबर को छोड़ कर जो पूरी नहीं कर पाया। लेकिन देश में मीडिया की सुर्खियां इस बात को बयान कर रही है कि हम जैसे एक बड़े संकट से दो-चार हो रहे है, और हम जैसे नादान लोगों को मालूम ही नहीं। मैं इतना तो जानता हूं कि मीडिया में जहां मैं काम करता हूं वो भी शेयर मार्किट के उपर-नीचे होने से प्रभावित होता है। लेकिन ऐसे कई सवाल है जो मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं और जब भी शेयर के उपर नीचे होने से परेशान या खुश होते अपने दोस्तों को देखता हूं और उलझ जाता हूं। मैं अपने सवाल सोचता हूं कि आपके सामने रख दूं बिना किसी शर्म या झिझक के।
1. रोज एक ही कंपनी में इतना बदलाव कैसे हो जाता है क्या उसके प्रोडक्शन में रोज में इतना बदलाव आता है।
2. एक ही दिन में कई बार कंपनियों के रेट में उतार-चढाव क्यों आता है।
3. शेयर मार्किट के उपर नीचे होने के क्या कारण है।
4. सरकार पर शेयर मार्किट के गिरने और चढ़ने का कितना फर्क पड़ता है।
5. सट्टेबाजी, जुए( गैंबलिंग),लाटरी, और शेयर मार्किट में कितना अंतर है।
5. और भूखे से मरते किसानों पर फैसला लेने में सरकार को भले ही महीनों लगते हो लेकिन शेयर मार्किट के गिरते ही सरकार कुछ ही घंटों में रिरियाने लगती है, ऐसा क्यों होता है।.............................
और भी जाने कितने ऐसे ही सवाल जो कभी आगे मैं कर सकता हूं। देश की तरक्की का आईना अगर कोई है मीडिया की नजर में तो वो मुंबई की दलाल स्ट्रीट। नाम भी खूब है दलाल स्ट्रीट देश के कई हिस्सों में इस मार्किट के नाम को ही गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
अप्टन सिनक्लेयर की एक कालजयी किताब जंगल में एक वाक्या लिखा है जिसमें एक बैंक ऐसे ही शेयर मार्किट में डूब जाता है और उसके शेयरों के भाव पूरी तरह मिट्टी में मिल जाते है। बैंक में इलाके के मजदूरों का पैसा जमा होता है। बैंक के बाहर अपना पैसा निकालने वालों की भारी भीड़ जमा हो जाती है। उसी भीड़ में शामिल एक मजदूर की सास है जिसकी रात-दिन की कमाई उस बैंक में जमा है अब वो परेशान है कि उसका पैसा कैसे डूब गया है। वो बार-बार भीड़ से पूछती है कि उसकी आंखों के सामने बैंक में बड़े बक्शों में पैसा रखा गया है ऐसे में बैंक डूब कैसे सकता है। कुछ लोग उसे समझाते है और वो समझ नहीं पाती है। ऐसा ही कुछ हम लोगों के साथ होता है। मुझे आज एक ऐसा ही नौजवान मिला जिसकी नौकरी शायद इसी की भेट चढ़ गयी है। उसके साथ कंपनी ने तेरह लोगों की छुट्टी कर दी है। मेरा इस सच्चाई से पहला ऐनकाउंटर है। दुनिया की महाशक्ति होने का ख्वाब पाले देश की अर्थव्यवस्था को चंद सटोरियों गिरा सकते है, ये बात और कोई नहीं यही दलाल स्ट्रीट कई बार साबित कर चुकी है। अब ठीक-ठीक आंकडा तो नहीं मालूम लेकिन मुझे याद है कि जब हर्षद मेहता का निधन हुआ तब उस पर लगभग 52 अरब रूपये की देनदारी थी और वो जो संपत्ति का इस्तेमाल कर रहा था वो लगभग 12 अरब रूपये की थी। यानि एक सड़क छाप आदमी देश के कानून का कबाड़ा करके जब चाहे देश के करोड़ो लोगों को नंगा कर सकता है और खुद कुछ महीने जेल में बीता कर मौज में उसी पैसे के सहारे अदालतों में अपने शिकार लोगों को एडियां रगड़-रगड़ कर मरते हुए देख सकता है। ये बात सिर्फ इसी बाजार के चलते संभव है। क्या ये एक ऐसी सट्टेबाजी नहीं है जिसमें महज सरकार का दिखावे के तौर पर दखल है और उसके असली मालिक हजारों लाखों करोड़ रूपये का काला धन रखने वाले है। जो कुछ सरकारी दलालों के दम पर हजारों करोड़ रूपया खाकर चले जाते है। फिर आते है और फिर से चले जाते है। लेकिन फिर एक कहावत याद आती है कि लालचियों के गांव में ठग भूखे नहीं मरते है। ये बाजार है क्या देश का इससे कितना मतलब है और आम आदमी की जिंदगी को ये कितना प्रभावित करता है जब तक ये मुझे समझ नहीं आयेगा मैं कभी नहीं समझ पाउंगा कि शेयर बाजार में देश का शेयर कितना है। ...........................

Thursday, October 2, 2008

बटला हाउस, हकीकत, कहानी, फसाना

कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज न बन जाए .....श्रीकांत वर्मा (मगध)
बात वहीं से शुरू करता हूं जहां कल अधूरी छोड़ दी थी। ईद का त्यौहार पूरे देश में मनाया जा रहा है। जामिया नगर में गया रिपोर्टर अपनी कवरेज के बाद वापस लौटा।
क्या माहौल था।
सवाल का जवाब देने के लिये उसने पूरा समय लिया सोचा और फिर कहा कि माहौल ठीक नहीं था। लोगों में बेहद नाराजगी थी।
किसको एनकाउंटर को लेकर।
वो बात तो अब पुरानी हो गयी फिर क्या बात थी।
रिपोर्टर का जवाब था कि लोग मीडिया कवरेज को लेकर नाराज थे।
नाराजगी इतनी थी कि उन लोगों ने इलाके की किसी भी मस्जिद से लाईव तक नहीं करने दिया। और ये नाराजगी किसी एक अकेले टीवी चैनल या रिपोर्टर को लेकर नहीं थी, बल्कि पूरे मीडिया से थी। वहां मौजूद एक रिपोर्टर ने अपने मुस्लिम नाम के साथ हमदर्दी दिखाने की कोशिश की तो उसको भी भीड़ ने झिड़क दिया। भीड़ का कहना था कि आप हमारे दर्द को समझ नहीं सकते हों। मस्जिद के बाहर ही काले रिबन बंट रहे थे और काले रिबन बांधे लोग कह रहे थे कि आप लोगों ने हमारे उपर लेबलिंग कर दी है। आप लोग हमारे शोक के कोई सहानुभूति रखने की बजाय पुलिस की कहानी को पत्थर की लकीर मान कर चला रहे है।
एक दूसरा रिपोर्टर दिल्ली के जामिया नगर से सैकड़ो मील दूर आजमगढ़ के संजरपुर गांव में मौजूद था। बातचीत हुयी तो पता चला कि गांव के लोगों ने ईद पढ़ी और एक दूसरे से गले मिल कर मुबारकबाद देना तो दूर हाथ तक नहीं मिलाया। मीडिया से वही बेरूखी, नाराजगी बरकरार थी। गांव वालों का कहना था कि मीडिया ने पूरे गांव को इस तरह से दिखाया कि गांव वाले आतंकवादियों को तैयार कर देश को उडाने में लगे है। उन लोगों का कहना था कि हमने अपने बच्चों को जामिया यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिये भेजा था ताकि वो अच्छे इंसान बने। अव्वल तो वो लोग बेगुनाह थे और अगर उनमें से कोई आतंकवादी भी बन गया था तो उसमें संजरपुर कितना और कहां से गुनाहगार ठहरता है ये बात तो मीडिया समझाये। पूरे गांव में ईद के नाम पर न शीर बनी न सिवईंयां।
ये दो बाते इस बात की ओर इशारा कर रही थी कि कही न कही दोनों ओर के लोगों के बीच अविश्वास की खाई काफी बढ़ गयी। बात इतनी ही नहीं थी कि, शहर में दूसरे समुदाय के लोगों से बात की तो अहसास हुआ कि उन लोगों को लग रहा है कि शहर में दिल्ली की प्रतिक्रिया में कुछ न कुछ होगा। क्या होगा या कितना होगा इस बारे में कोई ठोस जानकारी उनके पास नहीं है। एक ऐसे इलाके जहां अल्पसंख्यकों की आबादी काफी तादाद में है से ताल्लुक होने के नाते इस बात का अहसास मुझे भी है कि एक दूसरे से डर और अविश्वास का माहौल शहरों की शांति पर कितना भारी पड़ता है।
दरअसल पिछले कुछ सालों में एक के बाद एक धमाके हुये और अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने इस मामले में कुछ मास्टर माईंड लोगों को गिरफ्तार कर केस खोलने के दावे भी किये और फिर एक के बाद एक मास्टरमाईंड लोगों की गिरफ्तारियों का सच क्या है और उस सच से मुठभेड़ में मारे गये औऱ मौके से फरार आतंकवादियों का । उधर पुलिस की लाईन को पूरी तौर पर सही मानने वाले लोग या फिर पत्रकार इस बात से बेहद उत्तेजित है कि पिछले सालों में धमाकों की दर और उनमें मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। और मासूम लोगों का खून उनकी भावनाओं को सवालों से दूर कर रहा है। उनका कहना है कि अदालतों से मिलने वाले इंसाफ में इतना वक्त लगता है या फिर सालों बाद भी आंतकवादी छूट जाते है लिहाजा उनका विकल्प गोली ही है। और इस मामले में आतंकवादियों का मसूंबा इतना साफ होता है कि वो मेल करके धमाकों की जानकारी पहले ही दे देते है। इस बात को सिस्टम से जोड़ने वाले लोगों को कुछ पत्रकारों या फिर दूसरे धंधों से जुडे लोगों का सवाल खड़ा करना तीर की तरह से चुभ रहा है। वो सवाल खड़ा करने वालों को सीधा आतंकवादियों का समर्थक या फिर दलाल की भूमिका में खड़ा कर देना चाहते है। एक साथी से बातचीत के दौरान पुलिस की लाईन पर कुछ सवाल ही उठाये थे कि देश के सबसे बेहतरीन पत्रकारों में शुमार उस दोस्त ने गुस्से में कहा कि भगवान अगली बार बम फटे तो उसमें ऐसे पचास-साठ पत्रकारों के परिवार वाले मरे तब मैं उनसे सवाल पूछूंगा कि आतंकवादी कैसे लगते है। कुछ लोगों का कहना है कि सवाल उठाने वाले पत्रकारों ने कभी गोली को हाथ में लेकर भी नहीं देखा होगा गोलियों के बीच रिपोर्टिंग करना तो दूर है। इतना तो तय है कि ये लोग बेगुनाह लोगों से बेहद नफरत और अपने देश से बेहद प्यार करते है। और मासूम लोगों की लाशों की कवरेज और फोटो ने इन लोगों को इतना उत्तेजित कर दिया कि पुलिस पर उठाया गया कोई भी सवाल इनको देश के साथ गद्दारी लगता है। लेकिन ऐसी कई बाते है जो लगातार मुझे इस बात पर मजबूर करती है कि कैसे भी हालात हो हम पत्रकारों को सवाल उठाने के अपने मूल काम से मुंह नहीं मोड़ना चाहिये। सवाल सिर्फ सवाल करने के लिये नहीं बल्कि देश की एक बड़ी आबादी के वो सवाल जिनसे जांच अधिकारी मुंह मोड़ना चाहते है। इस पूरे मामले की देश भर में जिस तरह की प्रतिक्रिया हुयी है उसकी सही तस्वीर आने वाले कई सालों में ही साफ हो पायेगी। लेकिन इस बात पर मैं पूरी तरह आश्वत हूं कि दिल्ली के ब्लास्ट से शुरू हुये इस खौफनाक खेल में जांच एजेंसियों के खिलाफ काफी सवाल तो खडे होते है।
मुंबई ट्रेन ब्लास्ट की पूरी जांच कर मुंबई एटीएस ने उसके आरोपियों को गिरफ्तार कर अदालत में चार्जशीट भी कर दिया। फरार लोगों को पाकिस्तानी मूल का घोषित कर दिया। अब मुंबई की ही क्राईम ब्रांच ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया और साफ कहा कि ये है मास्टरमाईंड मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के। पाकिस्तानी लोग इसमें शामिल ही नहीं थे बल्कि ये पांच लोग ही पाकिस्तानियों के तौर पर उस ब्लास्ट के मास्टरमाईंड से मिले थे। अब आप सवाल उठा सकते है कि एक घटना को साथ में अंजाम देने वाले कितने मास्टर माईंड हो सकते है जो एक दूसरे से बिलकुल अनजान है। एक के बाद एक कई राज्यों की पुलिस ने इतने मास्टर माईंड खोज लिये जो एक दूसरे को नहीं जानते लेकिन घटनाओं को अंजाम दिये जा रहे है। क्या हर बार पुलिस अधिकारियों के दिये गये प्रेस नोट्स को मीडिया ने अदालत के फैसलों की तर्ज पर नहीं चलाया। क्या किसी को याद रहा कि सिमी के किसी भी कार्यकर्ता के खिलाफ मामला अभी प्रूव नहीं हुआ। यहां तक कि सिमी के फर्स्ट बांबर के तौर पर मीडिया में छाये रहे मुबीन की उस मामले में रिहाई भी मीडिया की नजर में नहीं आयी। ........................बात अभी बाकी है......