Tuesday, May 17, 2011

दिन को बोता कौन है

सर्द रातों में. रजाईं के अंदर मुड़ें हुए सपनों की दुनिया में
कुछ आवाजें आकर दस्तक देती थी
धीमें-धीमें अँधेंरे में रोशनी को टटोलती आंखों को
दिखता था बीच में रखा एक अंगार
कुछ देर में दिमाग जागता था कि
रात के आखिरी पहर में
हुक्के की बंसी नाच रही है
एक हाथ से दूसरे हाथ और बीच में सुलग रहा चिलम का अंगार
हमेशा मुझे एक अचरज रहा कि कैसे अंधेंरे में
खाटों के घेरे में बैठें ये बुजुर्ग एक दूसरे के हाथ से ले लेते है हुक्के की बंसी
उन्हीं आंखों के सहारे जिनसे दिन में भी कम दिखता है।
फिर से मेरी आंखें मूंद जाती
जब अम्मा की आवाज से आंखें खुलती तो देखता दिन चढ़ आया घर के कच्चे आंगन में
ताऊजीं और चाचा सब तो जंगल चले गएं।
एक दिन मैंने ताऊ जी से पूछ लिया
क्या करते हो ताऊ जी आप रात के अंधेंरे में जब कोई भी नहीं दिखता बिस्तर के बाहर
हंसी से बिखरते हुए ताऊजीं ने कहा
कि हम दिन को बोते है तुम्हारे लिए
ताकि वक्त का खूड़ तुमकों सीधा मिले।
उनकी हंसी मेरे जेहन में बनी है आज भी
जैसे घर के साफ आंगन में कोई बिखेर दे सफेद चावलों को चादर से उछाल कर।
साल दर साल मैं बड़ा होता चला गया
कम होता चला गया बंसी के हुक्के का घेरा
और मेरा गांव आना जाना।
राजधानी में कभी जरूरत नहीं पड़ी बोए हुए दिन को काटने की
सालों बाद गांव में लौटा
घेर में अकेले बैठे हुए तांबईं से चेहरे वाले ताऊजी को
नौकर के हाथ से भरे हुए हुक्के की बंसी को हाथ में पकड़े हुए
बेहद उदास आंखें, डूबी हुई आवाज से वक्त की डोर को पकड़े हुए
मैंने देखा अब कोई संगी-साथी नहीं है उनके साथ।
लेकिन कई बार बात करते हुए वो भूल कर अपना हाथ बढ़ा देते है अगली खाट की तरफ
जैसे थाम लेगा कोई हुक्के की बंसी को उनके हाथ से
फिर सहसा नींद से जागे हो जैसे वापस अपनी ओर खींच लेते है।
रात को उसी आंगन में सोते वक्त सालों बाद देखा उगे हुए चांद को ठीक उसी तरह
अपने छोटे से बेटे को बगल में लिटाएं
रात भर देखता रहा एक अकेले बूढ़े इंसान की उलझन को
मैं रात भर देखता रहा कब रात का आखिरी पहर हो
कब ताऊं जी उठें औऱ कोई खाटों के बिछे घेरे से थाम ले हुक्के की बंसी
फुसफुसाहटों के शोर से उठ जाएं मेरा बेटा
और ये देख ले कि किस तरह से दिन को बोते है बुजुर्ग
ताकि उसके लिए वक्त का खूड़ हमेशा सीधा रहे।
ताऊ जी की खांसी की आवाज नौकर का उठकर चिलम भरना
और मेरे अंदर जम गएं सन्नाटे में बस एक आवाज थी जिसको गले का रास्ता नहीं मिल रहा था।
ताऊजीं एक बार फिर से दिन को बो दो
मेरे बेटे के लिए

Sunday, May 8, 2011

नेताओं का छल और किसानों की नियति

ईश्वर ने जब अपने बेटों की ओर देखा और सोचा कि इनमें से कौन सा बेटा बाकि सब का ख्याल रखते हुएं अपने छोटे भाईयों का पेट भरेगा। फिर उसने सबसे सीधे और विनम्र बेटे को कहा कि तुम्हें अपने भाईयों का ख्याल रखना है। ये तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तु्म्हारा कोई भाई तुम्हारी वजह से भूखा नहीं सोना चाहिए। और इस सबका पेट भरने के लिए जरूरी है कि तुम सबसे ज्यादा मेहनत करोंगे। दुनिया तुम को किसान के नाम से जानेगी। किसान ने अपने भाईयों को लिया और उसके बाद उसने धरती का सीना चीर कर फसलें पैदा की और अपने भाईयों का उनके परिवार का पेट पाला।
ये कहानी कितनी सच है ये तो नहीं मालूम है लेकिन मानव विकास के दौरान किसानों ने अपने खून-पसीने से इंसानी समाज को सींचा।
लेकिन जब किसान के भाईयों ने अपने रोजगार फैलाने शुरू किये तो उनको अपने उस भाई का ख्याल नहीं आया जिसने उनको जिंदा रखने में सबसे ज्यादा मेहनत की थी। दलालों, व्यापारियों और सरकारों के बाद किसान को लूटने की बारी बिल्डरों की है। जातियों के नायक बन कर सिर्फ समीकरणों के सहारे सत्ता चलाने का वैधानिक अधिकार हासिल करने वाले बौने नेता सकार बन गए। बौने नेताओं की लाठी बने ब्योरोक्रेट्स जिनको विेदेशी शासकों ने गुलाम हिंदुस्तान की लूट को सुगम बनाने के लिए पैदा किया था। इतने शक्तिशाली कि हजारों करोड़ की लूट के बावजूद उनपर मुकदमा चलाने के लिए अनुमति मिलने में सालों कभी कभी तो दस साल लग जाएं। इन दोनों ने जब किसानो को हर किस्म से निचोड़ लिया तो एक नयी कौम पैदा कर दी और इसका नाम दिया बिल्डर। छोटे-छोटे सौदों में दलाली खाने वाले प्रोपर्टी डीलर अब शहर बसा रहे है। शहर बसाने के लिए जो जमीन चाहिए वो सिर्फ किसान के पास है लिहाजा उनके इशारे पर टके के राजनेता और रीढ़विहीन ब्यूरोक्रेट किसानों से जमीनें छीन कर उन हवाले कर दे रहे है।
देश भर में किसानों और सरकारके बीच जमीन के अधिग्रहण को लेकर झगड़े-आन्दोलन और प्रदर्शन जारी है। इसी कड़ी में ग्रेटर नौएड़ा में शुक्रवार को जो फायरिंग हुई और दो किसान मारे गए। कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे इन किसानों के साथ झड़प में दो पुलिसकर्मियों की मौत भी हो गई। इस खबर को लेकर न्यूज चैनल्स और अखबारों ने काफी वक्त दिया। राजनीति पर बात करना ऐसे है जैसे कोढियों में खाज के गीत गाना है। सत्ता में जो पार्टी है उसको अपनी कार्रवाई को जायज ठहराऩा है विपक्ष में बैठी तमाम पार्टियां इस वक्त देवदूत की तरह से सरकार के खिलाफ बयान जारी करेंगी या कर चुकी होगी। इस पर बात करना भी उल्टी करने जैसा ही है। कि ये नेता जब सत्ता में थे तब क्या हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए उऩ लोगों ने क्या इस बारे में को जवाब नहीं मिलेगा और न ही कोई सवाल खड़ा करेगा। लेकिन मैं इस बारे में नहीं सोच रहा हूं। मेरे जेहन में सिर्फ वो खबर है जो न्यूज चैनलों ने दिखाईं और बार-बार दिखाईं। खबर थी ग्रेटर नौएड़ा के डीएम यानि जिलाधिकारी या जिला कलेक्टर को गोली लग गयी। तस्वीरों में ्चो कलेक्टर भाग रहे थे और उनका घुटना खून से सना हुआ था। पूरे न्यूज चैनल्स को लग रहा था कि गुंडों और बदमाश किसानों ने संभ्रात डीएम पर गोली चला दी। कई न्यूज चैनल्स सरकार को इसलिए कोस रहे थे कि किस तरह से कानून व्यवस्था चल रही है डीएम तक पर फायरिंग हो रही है। इसी कड़ी में अगले दिन एक अखबार में खबर थी कि डीएम की पत्नी ने अस्पतालमें गुस्से में मीडिया के कैमरे वगैरह छीन लिये थे। कवरेज को लेकर नाराज थी। लेकिन गांव में पुलिस ने किसानों की फसलें जला दी बुरी तरह से मार की। औरतें और बच्चों का क्या हुआ। इस सब के लिए आपको फोटों और वीडियों दिख सकते है लेकिन इसकी वजह किसानों को बताया जायेगा प्रशासन को नहीं। मारे गए किसानों के बच्चों का भविष्य क्या होगा। किस तरह से उसकी पत्नी अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करेंगी क्या उसको भी इतना हक होगा कि वो अपने पति की लाश के फोटों खींच रहे फोटो जर्नलिस्ट के कैमरे छीन लेंगी। जवाब में आपको शायद भी लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी आपका जवाब होगा बच्चें सड़कों पर पलेंगे और बीबी शहर में जाकर बर्तन मांज सकती है और बर्तन मांजने वालियों का कोई निजता नहीं होती।
इस सबके बीच मीडिया की औकात नापने का पैमाना चाहिए तो देखिये कि जिस प्राईवेट कंपनी यानि जे पी गौर के लिए उत्तर प्रदेश सरकार दलालों की तरह से ये काम कर रही है उसका नाम तक लेने में अखबारों और न्यूज चैनलों के पसीने छूट रहे है। किसी विपक्षी नेता की औकात नहीं थी कि वो जे पी गौर की भूमिका की जांच करने की मांग करता। और अब ये भी जान लीजिये कि जिस एक्सप्रेस वे के लिए ये जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है उससे अमीरों के सिर्फ 90 मिनट बचेंगे। ये 90 मिनट कितने कीमती है इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सरकार हजारों किसानों के बच्चों को यतीम कर सकती है।

Friday, May 6, 2011

दिग्विजय की जबान, अमरसिंह के जूतें और बिन लादेन की मौत

सुबह
-सुबह घर में बड़ा हल्ला-गुल्ला मचा था। सारे नौकर इधर से उधर भाग रहे थे। पीए भी पसीना-पसीना हो रहे थे। आखिर मामला जूतों का था। वहीं जूते जिन को पहन कर एमपी अमरसिंह बयान जारी करते है। एक दम अमर सिंह से अफलातून हो जाने वाले बयान। ऐसे में अमर सिंह के घर से उनके वही प्यारे जूतें गायब हो तो परेशानी होनी स्वाभाविक है। अमरसिंह की त्यौंरियां चढ़ी हुईँ थी आखिर उनकी जुबां माफ करना जूतें गायब थे। इतने में एक नौकर ने आकर कहा जूते तो मिल गये है लेकिन वो अब घर में नहीं है।अमरसिंह ने पूछा कि कहां है जूते, नौकर ने डरते-डरते हुए कहा, टीवी देखिएं साहब। टीवी पर दिग्गी राजा भाषण दे रहे थे। और उनकी जुंबा जो उगल रही थी उसके बाद अमरसिंह का शक गायब हो गया था जुंबा माफ करना अमरसिंह के जूते अब दिग्विजय सिंह के पास थे। पिछले कुछ दिनों से राजनीतक रिपोर्टिंग कवर करनेवाले रिपोर्टर को समझ में नहीं आ रहा है कि अमर सिंह और दिग्विजय सिंह के बयानों में अंतर खोजना क्यों मुश्किल होता जा रहा है। अमरसिंह ने समाजवादी पार्टी में रहते वक्त अपने उल-जलूल बयानों से टीवी चैनलों में खूब सुर्खियां बटोरी।
बचपन की एक कहानी याद आती है कि एक गांव में रामलीला चल रही थी। लेकिन राम का अभिनय कर रहे बच्चें की तबीयत खराब हो गयी। ऐसे में उस रोल के मुफीद कोई बच्चा नहीं मिला तो एक मजदूर के बच्चें को पकड़ कर उस दिन राम का रोल दे दिया गया। गांव में मुख्य अतिथि इलाके का बदमाश भी आना था। बच्चा जब लकड़ी की के तीर कमान जिन पर चमकीली पन्नी चढ़ी थी और पीतल का मुकुट पहन कर स्टेज पर पहुंचा तो गांव के हर आदमी ने खडे़ होकर कहा जय श्री राम। इसके बाद रामलीला शुरू होने से पहले बच्चें की आरती की गयी और परंपरा के मुताबिक मुख्य अतिथि यानी उस बदमाश ने भी बच्चें के पैर छुएं। बच्चा बहुत हैरान था कि रोज गालियों से नवाजने वाले ये लोग उसको आज इतना सम्मान क्यों दे रहे है। थोड़ी ही देर में उसने अपने दिमाग में तय कर लिया कि ये सब इस मुकुट और तीर कमान की वजह से है। अब उसने निश्चय कर लिया कि वो इस तीर कमान और मुकुट को चुरा कर भाग जाएंगा। रामलीला के खत्म होते ही वो बच्चा मुकुट और तीर कमान के साथ गायब हो गया। अगले दिन सुबह-सुबह वो बच्चा उसी धुले हुए मेकअप में जब निकला तो गांव के लोग उस पर हंसने लगे, ठहाके लगाने लगे अब वो बच्चा चकरा गया कि ये लोग रात-रात भर में किस तरह से बदल गए है। अमर सिंह के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। मुलायम सिंह के मजमें में कुछ दिन का मेहमान बनने के बाद अमरसिंह अपनी जुंबान और जूते के साथ भाग निकले लेकिन अब उनको कोई भाव नहीं दे रहा है।

दिग्विजय सिंह का हाल कुछ अलग नहीं है। राजनीति का ककहरा सीखने वाले भी जानते है कि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में कांग्रेस का भट्ठा बैठाने के बाद दिल्ली पहुंचे। उनकी जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश दी गई। कुछ दिन बाद दिग्विजय की किस्तम का सितारा बुंलद हुआ और कांग्रेस के घोषित सेक्युलर सम्राट अर्जुन सिंह हाईकमाई की नजर से उतर गए। और स्वास्थ्य संबंधी कारणों और उससे भी ज्यादा मुस्लिमों में अपनी अपील के खत्म होने से घर बैठ गए अर्जुन सिंह का जूतों में अपने पैर घुसा कर दिग्गी ने अपनी राजनीति रथ यात्रा शुरू की। उनके बहुत से बयान तो लोगों ने पढ़ ही लिए। खास तौर पर अण्णा की टीम पर भ्रष्ट्राचार को लेकर कटाक्ष करने वाले दिग्गी की घिग्गी बंध जाती है जब उनके सामने शरद पवार और दूसरे उनकी खुद की पार्टी के नेताओं का काला चिट्ठा सामने आता है।

काफी दिन तक इन दोनों नेताओं ने आपसी गाली-गलौज की जुगलबंदी करने के बाद गलबहियां शुरू कर दी। कारण अज्ञात है। लेकिन हालिया बयान दिग्गी का आया है। अमर सिंह अब पैसे देकर भी पत्रकारों को बुलाएं तो नहीं आते है। उनकी प्रेस क्रांफ्रैंस कुछ नाटक के कारण कभी-कभी चर्चा का विषय बन जाती है। बेचारे जन नेता तो कभी बन नहीं पाएं लेकिन टीवी के लिए मनोरंजन जुटाने में हद तक कामयाब हो गए थे। अब अमरसिंह की समाजवादी पार्टी से रूसवाई के साथ दफा होने के बाद से उनकी धार कम हुई तो मीडिया मनोरंजन का जरिया बन गएं दिग्विजय सिंह।

ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद दिग्विजय सिंह को याद आया कि आतंकवादी या फिर कोई अपराधी मरने के बाद उसके शव को धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए उसका सम्मान करना चाहिएं। हां इस बात को और साफ कर देना चाहिये कि निजि तौर पर दिग्विजय सिंह से कोई वास्ता हमें नहीं है लेकिन हिंदुस्तान जैसे देश की सत्ता संभाल रही पार्टी के जनरल सेक्रेट्री की कोई तो हैसियत होती होगी। ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी की मौत के बाद उसके सम्मान का नारा लगाने वाले दिग्गी के इस बयान से पूरे देश को ही आपत्ति होगी। वोटों की फसल काटने की उम्मीद करने वाले दिग्गी को ये जवाब जरूर देना चाहिये कि अमेरिका को उनकी सरकार ने इस आंतकवादी की गिरफ्तारी या फिर मौत के लिए क्या इनपुट दिए थे। इनकी सरकार से क्या बातचीत की थी। इनका मिलिट्री सहयोग लिया था या फिर कोई दूसरा कारण कि अमेरिका को दिग्गी राजा के बयान पर ध्यान देना क्यों चाहिये था। ये ऐसे बयानवीर है कि ओबामा ने सुबह नाश्तें में जो मुर्गा खाया उसको हलाल किया या नहीं इस पर भी बयान दे सकते है। देश को इस पर क्यों ध्यान देना चाहिए सवाल तो ये भी है। लेकिन एक अरब लोगों वाले देश में एक सत्ता संभाल रही पार्टी का नेता ऐसे बेसिर-पैर के बयान देता है तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक है। अमेरिका ने पाक-साफ देश नहीं है।लेकिन वो एक देश है जिसका अपने नागरिकों के लिए एक वादा है कि वो उनके लिए सब कुछ करने को तैयार है।
ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी कमांड़ों द्वारा इस तरह मारने के बाद हिंदुस्तानी तथाकथित नेशनल मीडिया को भी ये जोश चढ़ा हुआ है कि हिंदुस्तान को दाउद इब्राहिम को मारना चाहिएं। कभी सेनाध्यक्ष बयान देते है तो कभी पूर्व विदेश मंत्री। टीवी पर खूबसूरत मेकअप के बाद अपनी बेवकूफाना भरी बातों से देश को उल्टी-सीधी जानकारी देने वाले ऐंकर हाथों की आस्तींनें चढ़ाएं बस एक ही बात कर रहे है कि अमेरका की तर्ज पर पाकिस्तान में दाउद का इलाज करना चाहिएं और हां एक और शब्द उधार ले लिया है सर्जिकल स्ट्राईक। आधे से ज्यादा ऐंकर वो है जो निठारी कांड में मंनिनदर और कोली दोनों को किडना सप्लायर साबित करने में जुट गएं थे। बिना ये जाने कि भैय्या किडऩी और सेम का बीज अलग होता है ऐसा नहीं है कि एक की जेब से निकाल कर दूसरे कि जेंब में डाल दिया। हां इतना जरूर जान ले कि ऐंकर जो बोलता है वो सामने स्क्रीन पर पढ़ता रहता है।
देश की सड़कों पर एक लाख से ज्यादा मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है। लेकिन अंग्रेजों के समय से पैसों वाले के मददगार कानून में इतने बदलाव के लिए तो मीडिया लड ले कि भैय्या एक्सीडेंट में किसी को मारने वाले की जमानत थाने से न हो। बेवकूफ बनाने वाले कानूनों से बेहतर है कि कोई सख्त कानून आएं ताकि अपनी मनमानी से किसी कि जान लेने वाले को थाने से जमानत न मिल जाएँ। अमरसिंह के जूतों से चल रहे दिग्गी बाबू को इस पर ध्यान देना चाहिएं कि किसी आतंकवादी की मौत पर रोने से बेहतर है कि वो इस कानून पर सवाल उठाएं. लेकिन मुस्लिम वोटों को लेकर कुछ ज्यादा ही संजीदा हो तो एक काम कर सकते है ये सिर्फ सलाह है माने न माने उनका काम कि लादेन के नाम से राघोगढ़ में अपनी हवेली में एक मजार बना दे और रात दिन उस पर दिया जलाएं हो सकता है उनकी बंद दुकान में इस बहाने ही सही वोटों के ग्राहक आ जाएं।

Sunday, May 1, 2011

शाही चुंबन के इंतजार में लाखों दीवाने

एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के दफ्तर की लिफ्ट से उतर रहा था। लिफ्ट में एक बेहद जानी पहचानी सूरत भी थी जिसका नाम याद नहीं आ रहा था। लिफ्ट सफर में अलग-अलग मंजिल पर रूक रही थी। चेहरे डसे पहचानी सी उस महिला के साथ दूसरी महिला ने कहा कि ये दोनो किस पैतालिस सेकेंड के तो होंगे। अचानक याद आया कि ये तो देश की मशहूर लेखिका शोभा डे है। मेरी समझ में अंग्रेजी कम ही आती है लेकिन उस अंग्रेजी में ये भी ये महिला अपनी लेखनी कम उट-पटांग हरकतों और बेकार से वक्तव्यों के कारण ज्यादा जानी जाती है। शोभा डे का जवाब था कि नहीं किस पैतालीस सेकेंड का नहीं था दोनों चुंबन कुल मिलाकर लगभग पैतीस सेकंड के होंगे। और इस के बाद वो लिफ्ट के उस सफर में उन चुंबनों की मीमांसा करती रही। बाद में मालूम हुआ कि चैनल में हुए डिस्कशन में शामिल हो कर लौटी थी दोनो महिलाएं जो डिस्कशन दुनिया में सबसे बड़ी शादी के जश्न में भारत के न्यूज चैनल कर रहे थे।
देश के बे लगाम और छुट्टे सांड की तरह से चल रहे इन न्यूज चैनलों के महान गणितज्ञों की सूचना है कि इस शादी को लगभग दो अरब लोगों ने देखा हैं। पूरी दुनिया की आबादी छह अरब के आस-पास है। इस आबादी में औरते, बच्चे भी शामिल है। हिंदुस्तानी न्यू नक्शें में तो अफ्रीका और एशिया के वो देश भी आते है जहां गरीबी और भूखमरी का साम्राज्य फैला हुआ है। ये अलग बात है कि इस के पीछे सबसे ज्यादा हाथ इंग्लैंड का ही है जिसकी तारीफों के पुल बांधते-बांधते हिंदुस्तानी मीडिया के नौनिहाल थक नहीं रहे है। खूबसूरत ऐंकर कम रिपोर्टर भाव विभोर हो रही है। गोरों के देश में ज्यादातर टीवी चैनलों ने जिन लोगों को भेजा होंगा उनका रंग भी कम से कम इतना गोरा तो होंगा ही कि वो बाकि हिंदुस्तानियों से अलग नजर आएं और बेहतर था कि वो लड़की हो तो फिर इस शादी की कवरेज में टीआरपी की लूट हो जाएं।
मैंने रात को देखा कि न्यूज चैनल्स पर गोरी चिट्ठी एंकर अपने आपको लुभावने लगने वाले लेकिन घटिया से अंदाज में इन दोनों चुंबनों पर चर्चा में जुटी थी। पूरी दुनिया में विकसित देशों में अलग-अलग विषयों पर चर्चाओं का फैशन रहा है क्योंकि ये देश सालों पहले गरीबी और भूख की महामारी से बाहर आ चुके है, लेकिन उन देशों में जहां भूख और कुपोषण आज भी समस्या है वहां चुंबनों पर चर्चा कितनों लोगों में उत्तेजना जगाएंगी ये वाकई दिलचस्प होगा। हो सकता है इस बारे में लंबी बहस हो जाएं कि आखिर दुनिया का इतना बड़ा आयोजन है इसकी रिपोर्टिंग देश के दर्शक जरूर देखना चाहेंगे। लेकिन हमेशा की तरह एक बात जेहन में घूमती है कि कौन से दर्शक है जो इसको देखना चाहते है और देश की खबरों को नहीं। बाबा, अघोरी, तांत्रिक, हंसी, सास बहू और ,,,इसके अलावा बंदर भालू दिखाने वाले चैनल अपने आपको जनता का पहरूआ जब समझते है तो हैरानी होती है। इस शादी की चर्चा अगले दिन के सभी तथाकथित नेशनल न्यूज पेपर्स में भी पहले पेज पर थी। और कोई हैरानी नहीं थी कि शाही चुंबन का फोटो हर अखबार का बिकाऊ माल था। देश के एक तिहाई जिलों में भूख से तड़पते लोग है। बीमारियों से मरते लोग है, राशन और पीने के पानी के लिए भागते और इधर-उधर दौड़ते लोग अब चैनल्स के लिए बिकाऊं विज्यूअल्स नहीं रहे। वो दौर चला गया जब एनडीटीवी इस तरह के विज्यूअल्स दिखा कर टीआरपी बटोरा करता था। आज टीवी में एक दो पत्रकार इसको अपना ब्रांड बनाकर बेचते रहते है लेकिन उनको देखता कोई नहीं है हां तारीफ सब करते है।
देश में चुंबनों पर इतना वक्त जाया करने वाले पत्रकारों को इस बात की याद कितनी है नहीं जानता कि सरकार में अभी भी इस बात की लड़ाई चल रही है कि देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की जनसंख्या को आंकने का फार्मूला क्या हो ताकि उनके नाम पर वोट भी मिलते रहे और उनके नाम पर आऩे वाली राहत राशि को डकारते भी रहे। आखिर कभी ये सवाल क्यों कोई टीवी चैनल नहीं पूछता कि जाम के वक्त गायब रहने वाले कांस्टेबल की तनख्वाह किस पैसे से आती है। यदि वो जाम के वक्त ही गायब है तो उसकी नौकरी की जरूरत ही क्या। शहर में जगह-जगह गर्मी में गर्मी में और सर्दी में सर्दी से दम तोड़ते इंसानों के आधार पर समाज कल्याण विभाग के अफसरों की संपत्ति जब्त क्यों नहीं होती। कभी इस बात पर भी चर्चा हो कि रोड एक्सीडेंट में हर साल अस्सी हजार से ज्यादा दम तोड़ने वाले लोगों के मामले में किसी को भी उम्रकैंद क्यों नहीं होती और तो और इंसान को मारने वाले ड्राईवर को जमानत सिर्फ थाने से ही क्यों मिल जाती है।
बात तो आप चुंबन की कर रहे है फिर इस में गुलामों के हालात पर तरस खाना विधवा विलाप सा ही है। चलिएं यूं ही सही एक बार आप को फिर से शाही चुंबन याद तो रहा।

Thursday, April 28, 2011

इंग्लैंड के नएं गुलाम, लंदन दूर कि कोलकाता ?

दिल्ली से लंदन दूर है या फि ोर कोलकाता ? ये सवाल अटपटा सा है। लेकिन दुस्तान में जो भी इंसान देश के तथाकथित नेशनल चैनल्स को देख रहा हो या फिर देश के अग्रेंजी के स्वघोषित राष्ट्रीय न्यूज पेपर को पढ़ रहा है तो उसका जवाब यही होगा कि लंदन में दिल्ली की आत्मा बसती है। कोलकाता यकीनन कोई दूर-दराज का शहर होगा। लंदन में ब्रिटेन की महारानी के पोते की शादी है। पिछले एक महीने से हिंदुस्तान में मीडिया बौराया हुआ है। किसी चैनल वालों से ये पूछना कि भाई बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना वाली शादी भी आंख के सामने होगी तो अबदुल्ला दीवाना होगा यहां तो शादी सात समंदर पार है और आप है कि पागलों की मानिंद घूम रहे है।
लंदन और कोलकाता का रिश्ता भी दिल्ली से एक खास है। 1942 में बंगाल में एक अकाल पड़ा था। भूख से मरने वालों की तादाद करोड़ तक पहुंच गयी थी। और जब आप इस अकाल के कारणों पर जाते है तो कई रिपोर्टस इस बात का जिक्र करती कि ये अकाल जितना बड़ा था उससे बड़ा बनाया था लंदन में राज करने वालों ने। हिंदुस्तान की आजादी की मांग को दबाना इसका एक बड़ा कारण था। दूसरा कारण था इंग्लैड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का घोर नस्लवाली रवैया। हिंदुस्तानी से पागलपन की हद तक नफरत करने वाले चर्चिल ने इस बात की जानकारी के बावजूद की करोड़ों लोग भूख से तड़प रहे है इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया। दूसरे राज्यों से भेजा गया अऩाज जानबूझ कर जमाखोरों के हवाले कर दिया ताकि बेतहाशा मंहगी कीमत से बंगालियों और भारतवासियों की कमर टूट जाएं।
देश की यारदाश्त बहुत कम है और जवान हो रही पीढ़ी की किताबों में ये बात मिलना भी मुश्किल है। लेकिन उस पीढ़ी को घूंट में पिलाया जा रहा है कि जॉन मेजर और गॉर्डन ब्राउन को न्यौता नहीं दिया है। देश के मुख्यमंत्रियों के नाम भले ही उस युवा और खूबसूरत ऐंकर/रिपोर्टर को न मालूम हो लेकिन ब्रिटेन की किस महारानी ने कब क्या पहना था उसे पूरी तरह से याद है। विदेश को कवर करने वाले पत्रकार वहां है देश में क्या चल रहा है इस बारे में किसी को शायद दो लाईन भी नहीं मालूम है। हिंदुस्तान के पडौसी देशों में क्या हालात है इस बारे में भी कई रिपोर्टर दो लाईन से ज्यादा बोल नहीं सकते है और वो लाईनें भी भारत सरकार के ब्यूरोकेट के बताई गयी होती है। लेकिन ब्रिटेन की दुल्हन कैट मिडलटन के मां-बाप का ताल्लुक किस खानदान से है इसका ब्यौरा उंगलियों पर है। कई रिपोर्टर की आंखों में इस कवरेज के दौरान जो चमक दिख रही है वो इस बात को दिखाती है कि वो रिपोर्टर से कम हीरोईन और हीरों के रोल में खुद को ज्यादा देखते है। उनका काम सूचना देना नहीं ग्लैमर की चांदनी स्क्रीन पर देना है।
बात वापस कोलकाता पर। पैतीस साल से ज्यादा शासन कर रहे वाम मोर्चे के खिलाफ पहली बार कोई पार्टी इस हैसियत में आई है कि उसे चुनौती दे सके। लेकिन दिल्ली में बैठे मीडिया के मठाधीशों की रूचि उसमें नहीं है। बंगाल में किस कदर बदलाव की कसमसाहट है इसका कोई ब्यौरा किसी न्यूज चैनल्स पर नहीं है।
बात तो बहुत लंबी है लेकिन देश में खुदीराम बोस और चापेकर बंधुओं की याद रखने वाले कितने लोग होगे। इस बात पर मैं पूरा इत्मीनान रखता हूं कि विदेश यात्रा पर घूम रहे और ब्रिटेन के महाराजा को माई-बाप कहने वाले इन रिपोर्टर को जरूर इस बात से कोई नाता नहीं होगा।

Tuesday, April 26, 2011

सचिन तेंदुलकर को नहीं राखी सावंत को दो भारत रत्न:

लगभग 6 महीने बाद आज कोई शब्द लिख रहा हूं। मैं कोई ऐसा लेखक नहीं हूं कि लोग मेरे लिखने का इंतजार करे। न ही मेरे लिखे का मेरे अलावा किसी के लिए कोई अर्थ है। लेकिन खुद के लिए ही आज छह महीने बाद ही की बोर्ड पर टाईप कर रहा हूं। मैं किसी यात्रा पर नहीं था। कुछ दिन इधर-उधर रहा। देश की सत्ता यानि दिल्ली से खासा दूर आया गया। कई यात्रा बेमकसद और बेवजह की। जाने कितने लेखकों ने कहा कि यात्रा आपको नये शब्द देती है। मुझे लगा बेमकसद यात्राएं बस यात्राएं होती है और कुछ भी नहीं।

पिछले छह महीनों में देश भर में हमेशा की तरह कुछ न कुछ चलता रहा। इस दौरान देश के तथाकथित नेशनल मीडिया को काफी कुछ मिला। पैसा और हमेशा की तरह बिकाऊं खबरें और सबसे बड़ा था क्रिकेट का दीवानापन। एक देश जहां लाखों की तादाद में दीवानें हों वहां आशिकी के लिए एक ऐसा खेल जिंदा है जो साहब लोगों की याद दिलाएं रखता है। यानि खोना कुछ भी नहीं और साहब बन जाना।

कई खास चीजें इस मायने से गुजरी। हिंदुस्तान ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत लिया। लगता था जैसे सदियों पुरानी कोई ख्वाहिश उतरी और पूरी हो गयी। टीवी चैनल्स कब ऐंटरटेनमेंट में बदल गए इस का किसी को पता नहीं चला था। लेकिन न्यूज चैनल्स क्रिकेटटैनमैंट में जब बदले तो सबको पता चला।

दिल्ली में बैठने भर से वो नेशनल हो जाते हैं, क्योंकि दिल्ली से देश की सत्ता का कारोबार चलता है। दिल्ली का वायसराय हाउस जिसे गांधी जी एक खैराती अस्पताल में बदलना चाहते थे लेकिन नेहरू एंड कंपनी ने उसे राष्ट्रपति भवन में बदल दिया,के पास के कमरों से ये देश चलता है। भौगोलिक सीमाओं में बंधा एक संवैधानिक तौर पर कागजों के पुलंदों में बंधा देश। नेशनल चैनल्स के लिए जब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देना हो तो संख्या बल बढ़ाने वाला देश। लेकिन अभी असम में एक चुनाव हुआ है। असम भी इस देश का राज्य है। इस राज्य में अभी क्रिकेट की कोई ऐसी टीम नहीं है जिससे तथाकथित नेशनल न्यूज चैनल इसको दिखा सके। लिहाजा ये चुनाव भी देश के नेशनल न्यूज वालों को नहीं दिखा। लेकिन न्यूज चैनलों का ऐंकर चिल्ला-चिल्ला कर इस राज्य की जनसंख्या को भी जोड़कर कि सचिन को भारत रत्न देना सवा अरब भारतीयों की मांग है। ये सवा अरब कहां से आते हैं भाई। असम पूर्वोत्तर की सात बहनों का मुख्य द्वार है। यहां से गुजर कर आप इस देश के सात राज्यों को छू सकते है देख सकते है और अहसास कर सकते है। लेकिन इस राज्य में सरकार का चुनाव हो रहा है और नेशनल न्यूज चैनलों को दिख नहीं रहा है कि चुनाव में कौन खड़ा है कौन मुद्दें हैं और क्या कहना है देश के इस राज्य का।

ये तथाकथित न्यूज चैनल्स सही मायनों में आतंकवादियों का एक मंसूबा तो पूरा करते ही है कि पूर्वोत्तर हो या फिर कश्मीर सबमें आतंकवादियों का एक ही तो गाना है कि दिल्ली को न आपकी परवाह है और न वो आपको अपने अंदर गिनती है। आप न्यूज चैनलों का न्यूज कंटेंट देख लीजियें एक महीने का टोटल न्यूज एअऱ टाईम मिला लो तब भी पांच मिनट टोटल आपको पूर्वोत्तर या गैर हिंदी भाषी राज्य की खबर नहीं मिलेंगी। ये कैसे राष्ट्रीय न्यूज चैनल है भाई।

इस बार देश के राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स की जबान पर एक ही बात लगी हुई है कि देश के सवा अरब लोगों की मांग सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न। कई न्यूज चैनल्स तो इस बात के लिए आत्मदाह तक करने को तैयार दिखते है कि भाई जल्दी दो, जल्दी दो। वर्ल्ड कप के मैंचों में भारत का राष्ट्रीय तिरंगा लहराने के अलावा पूरे स्टेडियम में कही भी देश नहीं दिखता। बीसीसीआई की टीम है हर टीम का खिलाड़ी करोड़पति है। कंपनियों के बैनर तले खेल रहा है। ये खेल अब भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा बाहर कही खेला नहीं जाता। हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी पैसे से बनी आईसीसी के लोगों ने पूरा पैसा उडेला लेकिन किसी भी देश में ये खेल लोकप्रिय नहीं हुआ। न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज इन तमाम देशों से क्लब के तौर पर ये खेल गायब हो गया।वहां खिलाड़ियों को इकट्ठा करना ही समस्या है।लेकिन गरीबी के महासागर में लूट कर नए बने अमीरों के देश भारत में अब ये राष्ट्रीय खेल है। एक ऐसा खेल जिसमें आठ देश ही दुनिया है। जिसमें जीत पर कोई पोडियम पर नहीं चढ़ता राष्ट्रगान नहीं होता।

ऐसे खेल के महानायक सचिन तेंदुलकर ने इस देश का ऐसा कौन सा मान बढ़ाया है ये बताना उस ऐंकर के लिए भी मुश्किल होगा जो चिल्ला-चिल्ला कर सचिन को क्रिकेट का भगवान बताने में जुटा रहता है। सिर्फ मनोरंजन है ये खेल। मल्टीनेशनल कंपनियों का खेल। पैसे कमाने में लिप्त भ्रष्ट्र राजनेताओं से भरी एडमिनिस्ट्टेटिव कौंसिल के सहारे चल रही इस मांग में ऐसा क्या है जिससे इस पर ध्यान दिया जा सके।

मुझे लगता है खेलों की दुनिया में क्रिकेट की हैसियत इससे ज्यादा कुछ भी नहीं जैसे डब्लू डब्लू एफ की कुश्तियां। उस खेल में भारत के खली ने काफी हल्ला किया है। स्टेडियम भरे रहते है बच्चें भी उस खेल के दीवाने है तो खली को क्यों नहीं भारत रत्न देने की मांग उठती है। आखिरकार वो भी तो मनोरंजन के खेल में भारत का झंडा उठाये है। और उसमें दुनिया भर के पहलवानों में खली ही अकेला हिंदुस्तानी है। सचिन तेंदुलकर से ज्यादा प्रतिभाशाली हुआ इस हिसाब से तो।

रही बात मनोरंजन करने की और इस लिहाज से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग उठ रही है तो अपना वोट राखी सावंत के लिए है। जो बेचारी इससे भी कम पैसे में देश का मनोरंजन कर रही है। उसके लिए भी लोग टीवी पर बैठते है वो भी जाती है लोग देखने आते है। और किसी न किसी तरीके से वो देश के मनोरंजन के लिए मसाला जुटाती है। लिहाजा मेरे वोट की कोई कीमत है तो मैं अपना वोट भारत रत्न के लिए राखी सावंत को देता हूं।

Tuesday, August 10, 2010

कलमाडी को सैल्यूट....नटवरलाल को मात

देश को किस-किस स्पर्धा में गोल्डमैडल मिलेगा, भारत का कौन सा खिलाड़ी अतंरराष्ट्रीय कीर्तिमान के करीब पहुंच सकता है। देश को कुल कितने मैडल हासिल होंगे। सवाल सिर्फ ये होने थे उस वक्त जब राष्ट्रमंडल खेलों के शुरू होने में महज 50 दिन हो गये हो। लेकिन आपके पास खबर आ रही है कि
चालीस रूपये का नैपकिन चार हजार रूपये में, चार सौ की कुर्सी छह हजार रूपये में जिस मशीन की कीमत ही बाजार में सत्तर हजार से लेकर चार लाख तक उसका 60 दिन का किराया साढ़े नौ लाख रूपये। हम आपको किसी ठग की कारीगरी नहीं बता रहे है बल्कि इस देश की इज्जत बचाने के नाम इतनी बेशर्मी के साथ लूटे गये हजारों करोड़ रूपये की खरीद का एक नमूना भर दे रहे है। ये ज्यादातर आंकड़े इस समय देश के मीडिया में तैर रहे है। लूट कहना भी लुटेरों का अपमान है। ये तो सरे-आम डकैती है। गिरोहबंद लूट का नया नमूना। मेहमानों को दी जाने वाली टाईयों का किस्सा भी अब खुलने वाला है जिसकी कीमत शायद पच्चासी लाख होगी। लगभग तेरह सौ टाईयां और कीमत 85 लाख रूपये। मीडिया ने इस समय अपने सर पर जैसे एक ही भूत बैठा लिया हो कि इस लूट के खलनायक सुरेश कलमाड़ी का सर चाहिये। सासंदों को इस वक्त एक ही बात दिख रही है कि देश के साथ मजाक हो रहा है। लेकिन ये सब एक पहलू है दूसरा पहलू है कि सब एक बात कह रहे है कि देश की इज्जत बचाने के लिये खेल हो जाने दीजिये। ये कौन सी इज्जत है जिसमें मां सरेआम नीलाम की जा रही है आप कह रहे है कि वचन दिया है इसीलिये नीलाम हो जाने दीजिये। देश में पैसे की कमी से कई खेल परियोजनाएं रोक दी गयी। देश में पैसे की कमी का रोना रोकर रोज टैक्स बढ़ाये गये लेकिन किसी ने उफ तक नहीं की। अब ये तमाम लोग देश की इज्जत की दुहाई दे रहे है। यानि आप से कह रहे है कि किसी मक्खी गिरी चाय को नहीं बल्कि मक्खियों से गिरी चाय को आप आंख बंद कर निगल ले। साफ दिख रहा है कि आम जनता के पैसों को एय्याशी और निजि सनक पर हनक के साथ खर्च किया गया। हजारों करोड़ लूटने के लिये देश भर से वांटेड कुख्यात ठग नटवरलाल भी इतना खूबसूरत प्लान तैयार न करता।
ये कहानी का एक पहलू है। हम दूसरे पहलू पर आते है। अभी जज की भूमिका में आ गया मीडिया पिछले सात सालों से क्या कर रहा था। संसद में बैठे ये गरीबनवाज क्या सोच रहे थे। अब विसिलब्लोअर की भूमिका निबाह रहे इस कमेटियों से जुड़़े लोगों को क्यों सांप सूंघा हुआ था। आप को सोचने की जरूरत नहीं है साफ तौर पर हम बता देते है कि लूट के खेल में सब शामिल थे। जब कोई लूट सार्वजनिक हो जाती है और उसमें एक पूरा समाज शामिल हो जाता है तो उसे आयोजन का नाम दिया जाता है। उसका महोत्सव होता है। ये भी लूट का महोत्सव है। सबने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। बात शुरू करते है 2002 से। दिल्ली के मयूर विहार, या आस-पास के किसी भी इलाके के प्रोपर्टी डीलर के पास आप गये होंगे तो याद होगा कि कैसे वो एक फ्लैट बेचने से पहले राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर फ्लैट के दाम बढ़ने की कहानी सुनाता होगा। मुझे याद है मयूर विहार के जिन फ्लेटों को लोगों ने 2004 में दस से बारह लाख के बीच में खरीदा है उनको राष्ट्रमंडल के नाम का हल्ला मीडिया में होते ही कीमतों को आसमान पर जाते देखा। यानि एक फ्लैट पचास लाख तक पहुंच गया। इस लूट में कौन शामिल था दिल्ली के आम नागरिक थे कि नहीं। अब बहुत आसान था ये कहना कि साहब हम को ज्यादा मिल रहा है तो क्यों न ले। ये वही आदमी होता है जो रिक्शा वाले के पांच रूपये ज्यादा मांगने पर उसकी मां-बहन और सरकार को गाली देने लगता है। लूट में हिस्सेदारी का खेल शुरू हो चुका था। डीडीए जिसको देश के सबसे भ्रष्ट्रतम डिपार्टमेंट की ख्याति हासिल है इस मामले में शामिल हो चुका था। इसके बाद पीडब्लूडी, और दिल्ली सरकार की वो तमाम एजेंसियां जिनको इसमें जरा सी भी भूमिका निबाहनी थी इस लूट में हिस्सा लेने जुट गये। एक के बाद एक टैंड़रर हुए कमीशन के तौर पर करोड़ों रूपये उगाहे गये। लेकिन किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई। बीजेपी हो या कांग्रेस तमाम पार्टियों से जुड़े बड़े-बड़े ठेकेदारों ने लूट की इस गंगा में अपने हाथ नहीं बल्कि पूरा शरीर ही धो लिया।
उधर ऑर्गनाईजिंग कमेटी में इस लूट को वैधानिक करने के लिये बाकायदा एक भर्ती अभियान चला जिसकी कोर टीम इस देश के नये नटवरलाल सुरेश कलमाड़ी ने पुणे से तैयार की। इसके अलावा जनता की गाढ़ी कमाई को कलम के सहारे लूटने वाले लोगों की पूरी जमात तैयार की गयी। दरबारी बुलाये गये। अब इस ढ़ांचे को सत्ता में बैठे लोगों ने सारी ताकत हस्तांतरित कर दी। लूट में सबका हिस्सा जाने लगा।
अब बात नये राजनेताओं की और उनकी सत्ता मंडली में जुटे नौकरशाहों की तो उनके लिये भी लूट का हिस्सा हाजिर था। अक्षरधाम टैंपल आपकी आंखों को दिखेगा कि यमुना बैड पर यानि नदी के पाट पर बना है लेकिन पैसे से अदालत में साबित हो गया कि नहीं ये यमुना तट नहीं है। अगर किसी को उसका उद्घाटन याद है तो ये भी याद होगा कि देश के नंबर वन चैनल को इस मंदिर के एक ट्रस्ट्री ने मंदिर में टिकट लगने के सवाल पर जवाब दिया था कि ये मंदिर नहीं है। तीन साल बाद सत्ता के लगाये गये टैक्स से बचने के लिये वही ट्रस्ट्री मुझे टीवी पर दिखायी दिये ये कहते हुए कि ये मंदिर है इस पर टैक्स क्यों लगाया जा रहा है। इसी ख्यातिनाम अक्षरधाम टैंपल की बगल की जगह तय की गयी खेलगांव बनाने के लिये। खेलगांव यानि जहां दुनिया भर के एथलीट रुकेंगे। लिहाजा यहां बनने वाली सुविधायें दुनिया भर में सबसे बेहतरीन होनी चाहिये। लिहाजा ब्लू प्रिंट तैयार हुआ। और जैसे ही ये बना तो लूट के लिये सबसे नायाब चीज सामने थी। महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी,नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे लुटेरे शर्मा जाये लूट की ऐसी साजिश देख कर। ना कोई तलवार उठी न कोई खून बहा और हजारों करोड़ रूपये के फ्लैट भ्रष्ट्र नौकरशाहों, राजनेताओं और देश का खून निचोड़ रहे उद्योगपतियों के लिये तैयार। नक्शे को देश समझने वाले किसी भी आदमी को ये समझ नहीं आ रहा है कि भाई जमीन डीडीए की बनाने वाले को पैसा डीडीए ने दिया और दूसरी तमाम सुविधा उनको सजाने का पैसा भी डीडीए देंगा सिर्फ बनाने के नाम पर हजारों करोड़ रूपये की लागत के ये फ्लैट एक निजि कंपनी को क्यों दिये जाये। इन फ्लेटों को खेल के बाद तुरंत बेचने की तैयारी हुई। लेकिन संसद में बढ-चढ़ कर बयानबाजी करने वाले नेता इस लूट पर चुप क्यों है कि भाई अगर आगे खेल होने वाले है तो फिर खेलगांव क्या फिर से बनेगा। दरअसल सारा खेल दस हजार करोड़ से उपर के इस खेल गांव में छिपा है जिसको लेकर कोई सवाल नहीं कर रहा है। कि क्यों इस खेल गांव को बेचा जा रहा है अगर आपको इस कंपनी से बनवाना था तो आप उसको बनाने की कीमत अदा करते और इस खेल गांव को आगे की खेल एक्टिविटी के लिये भी रखा जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस लूट के कई पहलू जो अभी देश के सामने नहीं आये है जिस कंपनी एम्माऱ-एमजीएफ ने ये फ्लेट तैयार किये है उस कंपनी पर छह हजार करो़ड़ रूपये की मनी लांड्रिंग के घोटाले में छापे पड़ चुके है। उस कंपनी ने इस के लिये जरूरी राशि भी विदेशी पैसे से नहीं बल्कि हिंदुस्तान से ही दी गयी है।
देश के सामने सबसे पहला सवाल है कि इस खेल के हजारों करोड़ रूपये के खर्च के बाद उसे हासिल क्या होंगा। पहले से मौजूद स्टेडियमों को तोड़ कर उन्हें दोबारा खड़ा कर दिया गया। इस तोड़-फोड़ की कीमत देश को चुकानी पड़ी इतनी कि नया स्टेडियम बन जाता एनसीआर की किसी भी जमीन में। अब खेल खत्म होने के बाद जब आप स्टेडियम गिनेंगे तो जितने खेल से पहले थे उतने ही बाद में मिलेगे। खेल गांव बिक चुका होगा। अमीरजादों औऱ भ्रष्ट्राचारियों की ऐय्याशियां उधर से गुजरने वाले हर हिंदुस्तानी का मुंह चिढ़ायेगी और उसका हिंदुस्तानी कानून से विश्वास गिराती रहेंगी। अगर कोई मजदूर उधर से गुजरेंगा तो वो ये सोच भी नहीं पायेगा कि उसके बच्चे के दूध पर टैक्स लगाकर तैयार की गयी है ये ऐशगाह।
दिल्ली की सड़कों पर फुटपाथ उखाड़ कर दूसरे लगाये गये। लेकिन पानी के नल नहीं। हजारों करोड़ रूपये टाईल्स उखड़ कर सामने पड़ी है वहीं उन पर बैठ कर भीख मांगते आदमी को देख कर भी किसी नेता को संसद में आवाज उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। रोज गुजरते हुए पत्रकारों को नहीं लगा कि खेल हो रहा है। पेज भर-भर कर मिले एड्वरटाईजमेंट ने सबकी जुबां पर ताला डाल दिया था। हर चैनल्स इस बात को साबित करने में लगा था कि कैसे इस देश की शान साबित होने वाले है ये राष्ट्रमंडल खेल।
लेकिन बात अब ये है कि आपके पास क्या विकल्प है। एक भी नहीं। जिन लोगों ने ये पैसा लूटा है उन लोगों को सजा दिलाने का कोई कानून आपकी किताब में नहीं है। मीडिया के इस सारे हल्ले के पीछे का सच यही है कि सुरेश कलमाड़ी के सिर की बलि लेकर इस पूरे मामले की इतिश्री कर ली जाये। और पैसे को लूट कर अपनी जेबों पर भरने वाले पर्दे के पीछे के खिलाडियों को साफ बख्श दिया जाये। ये चल रहा है खेल और इस बात से मैं तो पूरी तरह से मुतमईन हूं कि भ्रष्ट्रमंडल के खेल पूरी तरह से सफल होंगे।

Monday, August 2, 2010

देश की आंखों का पानी मर गया है

कई बार लिखना इस लिये भी मुश्किल होता है कि आप के पास कहने के लिये बहुत कुछ होता है और आप को लिखना सिर्फ कुछ पर होता है। देश यदि नक्शे को आधार माना जाये तो उथल-पुथल के दौर में है। मणिपुर हमारे देश का राज्य है आतंकवादी समर्थित छात्र संगठनों ने साठ दिन तक उसकी नाकाबंदी की बाकि नक्शे के कानों पर जूं नहीं रेंगी। कश्मीर में साफ तौर पर पाकिस्तान का झंडा लहरा रहे लोगों और पैसे लेकर पथराव करती भीड़ दिख रही है लेकिन नक्शे को कुछ मालूम नहीं है। ट्रेनों के एक्सीडेंट हो रहे है, नक्शे में कोई हरारत नहीं है। झारखंड और छत्तीसगढ़ में खानों के अवैध खनन के लिये देश के उद्योगपति अगर उन्हें देश का कहा जा सके तो अपनी चालों से आम आदमी जिंदगी को नरक करने में जुटे है। गरीब लोगों का नाम लेकर नक्सली कत्लेआम करने में जुटे है। देश का नक्शा सिर्फ एक गृहमंत्री को बोलते-देखता रहता है। दक्षिण भारत में क्या चल रहा है कोई नहीं जानता।
देश को मालूम चल रहा है कि दिल्ली में कलमाड़ी एंड कंपनी ने खेल का आयोजन किया है। नक्शे का इस खेल से बस इतना लेना-देना है कि सत्ता को उसके लिये आम जनता पर टैक्स लगाने है।आयोजन में नुमाईशी प्रतियोगिताएं होनी है। हैंडबाल और टेनिसबॉल जैसे खेल खेले जायेंगे जिनके किसी खिलाड़ी के बारे में मुझे तो कोई जानकारी नहीं है आपको हो तो हो। कोई रिकार्ड देखने में दिलचस्पी रखता हो तो उसके लिये रिकार्ड बुक उपलब्ध है। किसी भी चश्में से देखने पर रिकार्ड बुक में ये नहीं दिखेगा कि कॉमनवेल्थ के किसी खेल का बना कोई वर्ल्ड रिकार्ड है। ऐसे में पूरे देश को भूलकर सत्ता इसमें क्यों मदहोश है। बात बिना लाग-लपेट के कहनी हो तो इस तरह कही जा सकती है कि ये लूट का महोत्सव है सबकी अपनी-अपनी हिस्सेदारी है। लोग देश की इज्जत नहीं बचा रहे है, इज्जत के नाम पर की गयी लूट बचाना चाहते है। देश की इज्जत भूख से मरते लोगों से खराब नहीं होती है, देश की इज्जत पर करोड़ों गरीब लोगों के तिल-तिल मरने से असर नहीं होता है और देश की इज्जत- लुटेरों को सरंक्षण देने से खराब नहीं होती है लेकिन इज्जत खराब होती है विदेशी मेहमानों को घटिया शराब परोसने से, वो खराब होती है दिल्ली की सड़कों पर विदेशी मेहमानों के सामने भिखारियों के नजर आने पर वो खराब होती है विदेशी और उनके यहां बैठे चमचों की अय्याशी में कमी रह जाने पर। गजब है कि किस कदर झूठ को जिंदा रख कर उसे सच में तब्दील कर दिया है।
कॉमनवेल्थ खेल का आयोजन हासिल करने से शुरू करे तो आपकी आंखें खुली रह सकती है। खेल के आयोजन के लिये हुए मुकाबले में भारत को कामयाबी उसकी खेल क्षमताओं की वजह से नहीं बल्कि भाग लेने वाले देशों को सबसे अधिक रकम ऑफर करने से मिली। ये आरोप उस समय बहुत शिद्दत से लगाया गया था। लेकिन कलमाड़ी एंड कंपनी इस खेल में काफी तेज है लिहाजा जीत गयी। आपको किसी को शायद याद नहीं होगा कि 1982 में हुए एशियाई खेलों के आयोजन के लिये एक खेल गांव बना था उस समय के तमाम ऐशो-आराम को ध्यान में रख कर। खेल खत्म हुए तो इस बेशकीमती प्रोपर्टी को भविष्य के लिये न रख कर कौडियों के मोल बेच दिया गया नेताओं-ठेकदारों और चंद राजनीतिक चमचे पत्रकारों को।किसी ने ये सवाल नहीं किया कि भाई आगे भी खेल होंगे और इनकी जरूरत होगी। ये जानते थे सत्ता के ठेकेदार की फिर से कमाई होंगी। पूरे दिन फावड़ा-कुदाल चलाकर एक गरीब औरत जो रोटी हासिल करती है वो भी कलमाड़ी जैसे नेताओं के ऐशोआराम के लिये टैक्स भरती है। आप सिर्फ इस बात को सोच कर देखें कि दूध पावडर के एक डब्बे पर आप कितना टैक्स देते है। वो भी उस टीम के लिये जिसको सुप्रीम कोर्ट में ये नेता है कहते है कि राष्ट्र की नहीं खेल संघों की निजी टीमें है।
करप्शन के इस हल्ले के पीछे किसी की भलमनसाहत नहीं है न ही किसी के खून में उबाल आया है बल्कि डीडीए ने जो खेलगांव बसाया है उसी की लूट से ध्यान हटाने की कोशिश है ये। क्या कोई 3 से लेकर 8 करोड़ के फ्लैट खरीदेगा। यदि आम आदमी नहीं खरीदेंगा तो डीडीए ने किस के लिये उस कंपनी से ये फ्लैट खरीदे जिसको कॉन्ट्रेक्ट की शर्तें पूरी न करने की वजह से सजा देनी चाहिये थी।लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने ऐसा नहीं किया बल्कि उस कंपनी को गरीब औरत की खून-पसीने की कमाई को सौंप दिया गया।
राजनीतिक पार्टियों की नूरा-कुश्ती काफी तैयारी से हुई है। कांग्रेस के नेताओं ने भी शोर इसलिये मचाना शुरू किया है कि वो जानते है कि कॉमनवेल्थ की नौटंकी के बाद जब तंबू उखडेगा तो बबाल मचेगा। पहले से शोर मचाने से ये होगा कि छोटे-मोटे ठेकेदार एक दो इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई हो जायेगी और हजारों करोड़ रूपये अंदर हो जायेंगे। मुख्य विपक्षी पार्टियों में बीजेपी की बात करते है क्योंकि यादव बंधुओं को जाति और धर्म की नंगी सियासत करते हुए हम रोज देखते है उनके एजेंडें सब को मालूम है। बीजेपी के नेताओं को आप रोज हल्ला करते हुए देख रहे है। लेकिन बीजेपी के प्रर्दशन में शामिल होने वाले नेताओं की कंपनियां कई टैंडरों में शामिल है। उनकी कंपनियों ने इस कॉमनवेल्थ की भ्रष्ट्राचारी गंगोत्री में अपने हाथ धो लिये है अब तर्पण की बारी है। विजय मल्होत्रा तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष है आजतक कितने तीर चलायें है उन्हें ईमानदारी से मालूम होगा।
बात तथाकथित न्यूज चैनलों और राष्ट्रीय अखबारों की। राहुल महाजन ने अपनी पत्नी डिंपी की पिटाई की गुरूवार की सुबह लगभग आठ बजे शुरू हुई ये खबर बिना नागा शनिवार तक चल रही है। चैनलों के बड़े-बड़े धुरंधर रिपोर्टर लगातार इस पर फोन इन करते रहे। एक चैनल के न्यूज रूम में बड़े पत्रकार साहब से बात हुई कि भाई ये क्या है तो उन्होंने कहा कि इसके अलावा आप बताओं देश में खबर क्या है। अब कुछ कहना-सुनना बेकार था। सीआरपीएफ के पांच जवानों को उड़ा दिया उल्फा के आतंकवादियों आज के दिन ये कह कर मैं उन पांच बदनसीब शहीदों की बेईज्जती नहीं कराना चाहता था। लेकिन ये तो दूर की बात है मैं तो उसको ये भी नहीं कह पाया कि भाई एक दिन अपने रिपोर्टर को दिल्ली के बदरपुर इलाके से लेकर शुरू कराओं और नरेला तक ले जा कर देखों कि सड़क पर सत्ता की ओर से कितने सार्वजनिक नल दिये है जिनसे आम आदमी पानी पी सके। मेरा अपना आकलन है एक भी नहीं । दिल्ली पानी मांग रही है और यहां देश के आंखों का ही पानी खत्म हो गया।....

Sunday, July 11, 2010

प्रेमी जोड़ों का कत्ल और नौजवान राजनेताओं की चुप्पी

बेगुनाह प्रेमियों को मौत के घाट उतारने के आदेश देने वाली खाप पंचायतों के बारे में कानून बनाने की पहल हो गयी। केन्द्र सरकार ने मामले को मंत्रियों के समूह को सौंप दिया। मीडिया में हो रही सनसनीखेंज आलोचना को शांत करने का एक दांव। मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिये एक और दांव कि राज्यों से प्रस्तावित कानून में राय ली जायेगी। राज्य अभी पुलिस सुधार कानूनों पर सालों से अपनी राय नहीं दे पाये हैं। राज्य के नेता वोट की लोटा-डोरी रखने वाली खाप पंचायतों पर कानून बनाने की राय राजनीतिक चश्में से देखें बिना देंगे ये यकीन किसी को नहीं। क्योंकि मौजूदा राजनीति की बुनियाद जातिवाद यानि जातियों पर टिकी हैं ये खाप पंचायतें। यकीन के लिये किसी सबूत की जरूरत नहीं है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने बाकायदा खाप पंचायतों के समक्ष पेश होकर उनके समर्थन का भरोसा दिया। चौटाला को लेकर किसी को शक नहीं हो सकता। अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर हजारों करोड़ रूपये की अवैध संपत्ति बनाने के आरोपों के चलते सीबीआई दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे इस नेता का वोट बैंक एक खास जाति को छोड़कर और कुछ नहीं है। लेकिन नवीन जिंदल को क्या हुआ। देशवासी को तिरंगा फहराने की लड़ाई अदालत में लड़कर नायक बनने वाले नवीन जिंदल को इस मामले में खाप पंचायतों का समर्थन करने की जरूरत को कैसे समझा जायेगा। सिर्फ इस बात के अलावा कि पैसे कमाने के लिये दुनिया भर में हवाई जहाज में घूमने वाले नवीन जिंदल वोट के लिये गांव में बस चलाने की बजाय बैलों की गाड़ी का समर्थन कर सकते है। अपने बिजनेस ग्रुप को राजनीतिक कवच देने के लिये कुछ भी करेंगे देश के युवा विजन के ये साहब। युवा जोड़ों को मौत मिल रही है। लेकिन युवा नेता(सांसद) कहां है। नये जमाने के नये नायक राहुल गांधी की आवाज कहां गयी। हर सभा में मंच पर नंगी तलवार लहराने वाले बीजेपी के युवा ह्रदय सम्राट वरूण गांधी की चुप्पी आवाज से ज्यादा बोली। इसके अलावा सचिन पायलट, जतिन प्रसाद, अखिलेश यादव, जैसे युवाओं की जुबां तालू से क्यों चिपकी हुई है। आप इसके पक्ष में है कि विपक्ष ये तो साफ हो। देश के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में इस समय ये बहस सबसे ज्यादा टीआरपी में है लेकिन ये युवा नेता बेचारे सीन से गायब है। कारण बूझों तो जाने की तर्ज पर नहीं है। हर किसी को मालूम है परिवारवाद के नाम पर जाति के दम पर चुने जाने वाले युवा किसी मुसीबत को न्यौता देकर अपना फायदा खत्म नहीं करना चाहते।वोटरों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये नेता खूब जानते है कि उनकी जान सिर्फ उनकी जातियों के वोटरों में बसी है। इन्हीं के दम पर चलेंगी देश की आने वाली राजनीति। एक और कड़वी हकीकत से रूबरू होना है तो इन लोगों की पढ़ाई-लिखायीं कहा हुई है ये और देख लेना चाहिये। विदेशों के स्कूल-कालिजों से अपनी शिक्षा हासिल करने वाले ये लोग देश के सबसे गरीब आदमी की बात करते है टीवी के कैमरों के सामने। मीडिया को कोसते है गरीब आदमी की खबरों को न दिखाने के लिये उसी मीडिया को जिसके कैमरों में आने के लिये पत्रकारों को उनके पीआरओ पैसा और गिफ्ट देते है।
मीडिया के लिये पहले ये खबर सिर्फ पिछड़े इलाकों की कहानी थी। ऐसे वर्गों की जिनके पास टीआरपी मीटर नहीं है लिहाजा वो दिखाने लायक कहानी नहीं थी। लेकिन एक के बाद एक होती घटनाओं ने दिखाया कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा की पंचायतें शहरों में लूट में लगे वर्ग के लिये मनोरंजन का साधन हो सकती है। इनको जंगली दिखाकर दिल्ली और मुंबई में लाखों रूपये के साथ खेल रहे लोगों का मनोरंजन किया जा सकता है। एकाएक हर रिपोर्टर तालीबानी-तालीबानी चिल्लाने लगा हर खूबसूरत एंकर को लगने लगा कि बेगुनाह नौजवानों को टुकड़े-टुकड़े कर रहे बूढ़े रावण और कंस जैसे मिथकीय विलेन से बड़े विलेन। ये सब मनोरंजन की चीख-पुकार थी। ऐसी चीख-पुकार जिस पर महानगरों में बैठे लोग चाय की चुस्कियों और दफ्तरों में घूसखोरी करते हुए अपना टाईम पास कर सकते है। ऐसा नहीं है कि मीडिया को इतनी समझ नहीं कि कैसे दोगले नेताओं की पोल खोली जाये लेकिन उसको मालूम है कि आज जो सत्ता में है उनकी बांटी गयी रेवड़ियां हाथ में तभी आयेगी जब उनके दुर्गुणों उनकी अदा बताया जाये। और जो आज विपक्ष में है वो कल सत्ता में होंगे तो कल की बटेर को भी ढ़ेला क्यों मारा जाये जब आज का कबूतर हाथ में हो तब भी।
मीडिया के दोहरे मानदंड़ों को दिमाग में ताजा करना हो तो इस बात के लिये आप देख सकते है कि कैसे राजनीति से परिवाद का मुद्दा गायब किया गया। चरणसिंह को अपने अमेरिका पलट बेटे अजीत सिंह में किसानों का नायक दिखा। अजीत सिंह को अब उनकी राजनीति का वाहक सिर्फ जयंत चौधरी में दिख रहा है किसानों का भविष्य। मुलायम सिंह यादव ने शायद कसम खायी है कि अपने परिवार के 21 साल से ऊपर के हर सदस्य को राजनेता बना कर दम लेंगे। बीजेपी के बुरी तरह से हारे जननायक राजनाथ सिंह को लगता है कि उनके बेटे में उनकी जाति का नायक छिपा हुआ है। हर आदमी को मालूम है कि इन नेताओं की राजनीतिक ताकत उनकी नीतियों में नहीं जातिवाद में छिपी हुई है। आकंड़ेबाज चाहे तो ये बात उनके मिले वोटों के आंकड़ों से चैक कर सकते है।
वैसे भी इस मामले में हिंदी भाषी राज्यों की जातियां कुछ ज्यादा ही मुखर है। ऐसी पंचायतों की मुख्य भूमि हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब और कुछ राजस्थान में है। ऐसे में इस इलाके के युवा नेताओं की आवाज सुनाईं नहीं देना कोई हैरत नहीं बल्कि मीडिया का इस पर ध्यान न देना कुछ ज्यादा हैरानी देता है.....

अजब लोग हैं बोलते क्यों नहीं...

जुबां है मुंह में
सवाल हैं जेहन में
फिर भी लब खामोश हैं
अजब लोग हैं बोलते क्यों नहीं...
आंखों में जूनूं भी
बदन में तपिश भी है
गुजरते है बिना जुंबिश के
अजब लोग है
जुल्म सहते है बेआवाज
अपने को तौलते क्यों नहीं
मौहब्बत भी दिल में
थिरकन भी बांहों में
खून देखते है सड़कों पर चुपचाप....
अजब लोग है
खौलते क्यों नहीं

Saturday, July 3, 2010

लोकतंत्र के लुटेरे....,समाज का छाता

कोई भी डिनर मुफ्त में नहीं होता। एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने देश की जनता को चेताते हुए कहा था। लेकिन हिंदुस्तान के मौजूदा हालात में हम लोग इतना ही संशोधन कर सकते है कि कोई भी डिनर मुफ्त में नहीं होता लेकिन हम डिनर का बिल किसी ओर से वसूल सकते है।
बुरा दौर गुजर गया। देश 8.50 की विकास दर हासिल कर लेगा। अब महंगाई रोकने के लिये ब्याज दर बढ़ानी पड़ेगी। मंहगाईं की दर को रोकना काफी मुश्किल है। थोक मूल्य का सूचंकाक बढ़ोत्तरी की ओऱ है। ये खबरें पिछले कुछ महीने में अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में रही। देश भर में मंहगाईं को लेकर सनसनी फैलाई गयीं। मुख्य विपक्षी दलों (अगर विपक्ष है तो) के बयानबीरों ने टीवी चैनलों में बयान दिया कि वो मंहगाईँ के खिळाफ धरना देंगे। किराये की भीड़ के दम पर जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक भीड़ इकठ्ठा हो जायेगी। देर नहीं हुई तो नेताजी बिना बेहोश हुए घर चले जायेंगे। पांच हजार करो़ड़ रूपये के ग्रुप का मालिक नेता प्रतिपक्ष। पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति हैसियत। देश का प्रधानमंत्री विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा। तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनो आय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे है। गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती इन लोगो के वैभव देखकर देवलोक के देवराज इन्द्र को शर्म आ जाये।
इन लोगों की हैसियत से आप को लगता है कि इन लोगों को महंगाई छू कर भी गुजर सकती है। सबसे ज्यादा महंगाईं इऩ लोगों के दम पर आती है। इन लोगों का ऐश्वर्य जुटाने के लिये ही मंहगाईं हर बार बढ़ती है।
फिर से मंहगाईँ बढ़ गयी है। प्रधानमंत्री ने कहा कोई चारा नहीं था। पेट्रोल,डीजल, कैरोसीन और घरेलू गैस के दाम एक साथ बढ़ाये दिये गये। सरकार चाहती है कि वो लोगों की आखिरी सहनशक्ति की सीमा भी देख ले। सत्ता में बैठे हर राजनेता ने इसका सर्मथन किया और विपक्ष में बैठे देवताओं ने निंदा। समर्थन देने वाले राजनेताओँ ने इस अपनी औकात के मुताबिक इसका फायदा उठाने वाले बयान दिये। ये सब बाते आपने पढ़ी, देखी और सुनी होंगी।
महंगाईं को लेकर दो महीने पहले भी दिल्ली में भीड़ जुटी थी। हजारों की रैली में आये लोगों को देखकर दिल्ली के लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ी। उन लोगों को ट्रैफिक जाम के लिये गालियां दी। मीडिया में बैठी सजी-धजी एंकरों ने गुस्सा जाहिर किया कि ये लोग दिल्ली क्यों आते है। तभी एक सवाल जेहन में आाया कि क्या मंहगाईं क्या सिर्फ उन लोगों के लिये उन लोगों के लिये है जो दिल्ली में सरकार से विरोध जताने आये थे। या दिल्ली में भी मंहगाईँ थी। मंहगाईँ तो दिल्ली में भी थी। फिर दिल्ली के लोग या फिर दूसरे महानगरों के लोग विरोध प्रर्दशन करने क्यों नहीं निकलते है। लेकिन जब इसका जवाब मिला तो लगा कि पैरों तले की जमीं ही खिसक गयी।
चंबल के बीहड़ों में खबरों को कवर करने के दौरान एक बात पता चली कि डाकूओं को रोटियों की कीमत एक दो दस गुना नहीं बल्कि पांच सौ गुना तक देनी होती थी। गांव-देहात में किसी अनजान को भी पानी पिलाना
पिलाने वाला का सम्मान माना जाता है लेकिन यहीं पानी जब किसी डाकू गिरोह को दिया जाता था तो उसकी भी कीमत वसूल की जा रही थी। ये अर्थशास्त्र समझ में नहीं आया। सालों बाद महानगरों में काम कर रहे माफिया गिरोहों की कार्यप्रणाली देखी तो समझा कि वो लोग भी अपने पैसों को पानी की तरह बहाते है। एक पुराने पुलिस वाले ने समझाया कि ये लूट के माल की सामाजिक हिस्सेदारी है। लूट में हिस्सेदारी इससे सुरक्षा मिलती है और साथ माफिया गतिविधियों को सामाजिक होने का जामा भी। आज जब मंहगाईं को चरम पर जाते देखा और दिल्ली या ऐसे ही किसी महानगर के लोगों को इस मंहगाईं पर चुप कर बैठते देखा तो वहीं ख्याल आया।
दो दशक पहले सरकार को डर लगता था कि पेट्रोल में एक रूपये की तेजी भी महानगरों में विरोध प्रदर्शनों को न्यौता देंगी। लेकिन नब्बे के दशक में एकाएक महानगरों में सरकारी काम-काज संभालने वाले बाबूओं की सेलरी में हजारों रूपये का रातो-रात इजाफा फिर प्राईवेट कंपनियों में लाखों लोगों की लाखों रूपये की सैलरी की आमद। कुछ ही रातों में ये लोग देश की 88 करोड़ की जनता से निकलकर विशिष्ट जनों में शामिल हो गये। इन लोगों ने अचानक ऐसा कोई काम नहीं किया था कि ये लाखों रूपये के फायदे के एक दम से हकदार हो जाये लेकिन फिर भी इऩकी जेंब में पैसा आ गया। अब ये पैसा लूट के पैसे के तौर लगा। ये बात इन लोगों को भी मालूम थी कि घोर गरीबी में डूबे गांवों में स्कूल, सड़के और बिजली भेजने का पैसा उनकी जेब में आ रहा है। और यहीं से शुरू हो गया लूट में हिस्सेदारी का फार्मूला। देश के महानगरों में रहने वाले लोगों की आम नौकरी का वेतन देश के बाकी हिस्सों से कही ज्यादा है। इसीलिेय जब पेट्रोल का दाम बढ़ता है तो महानगर के आदमी को सिर्फ एक खुजली होने से ज्यादा कोई परेशानी नहीं होती। जब एक किलो दाल का भाव किसी मजदूर की एक दिन की मजदूरी के बराबर हो जाता है तब भी दिल्ली में नौकरी कर रहे लोगों को परेशानी नहीं होती। वो जानते है कि लूट में हिस्सेदारी करनी होंगी। क्योंकि लूट के इस खेल में वो अपना हिस्सा ले रहे है तो इस को बांट कर सामाजिक मान्यता तो हासिल करनी होंगी। आटा, तेल , नमक,चीनी, साबुन और भी दूसरी जरूरी चीजों के दामों में बढ़ोत्तरी बस ऐसी ही लगती है जैसी एक वसूली में कुछ पैसों का बढ़ जाना। और शायद यही कारण है कि महानगरो की एंकर हो या फिर आम निवासी सबको लगता है कि भूखे-नंगें लोग आकर इस लूट के खिलाफ अगर आवाज उठाते है तो इससे पर्दाफाश हो सकता है।
ये सब अचानक नहीं हुआ। लाखों लोगों की एक ऐसी फौज तैयार की गयी जो देश के सत्तर करोड़़ गरीबों की रोटियों के दम पर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाने में जुट गयी। और ये वर्ग ऐसा था जिसकी जिम्मेदारी थी कि वो राजनेताओं और सरकारों पर नियंत्रण रखें और नीचे वाले लोगों के साथ अपनी सद् भावना।
आखिर मंदी किसके लिये आयी थी। मंदी कहां से आयी थी। मंदी का फायदा किसे मिला। मंदी का नुकसान किसने झेला। इस सवाल को मीडिया ने काफी धुंधला कर दिया। इतना धुंधला कि कोई आदमी साफ देख ही न सके। मीडिया ने एक खास मकसद से पूरा खेल इस तरह से खेला कि जैसे मंदी से देश का व्यापारी वर्ग पूरी तरह से परेशान है। पहले लेबर ला में संशोधन किये गये। फायदा किसे मिला बड़े व्यापारियों को। हजारों करोड़ रूपये की देनदारी साफ कर दी गयी। ये देनदारी किस पर थी। बैंकों में जमा पैसे किसके थे। इस बात पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया।
कोई बड़ी कंपनी फेल नहीं हुई। छोटी ईकाईयां बंद हो गयी। किसी बड़ी ब्रांडेड कंपनी की सेल बेस सेल से नीचे नहीं गयी। लक्जरी कारों और आईटम की सेल का ग्राफ लगातार उपर उठता रहा। हजारों करोड़ रूपये की छूट दे दी गयी एक्सपोर्ट के व्यापारियों को।बात खत्म करनी है तो यही कहा जा सकता है दाने-दाने को मोहताज देश के करोड़ों लोगो ने चुकाया देश के अमीर व्यापारियों, नेताओं और महानगरों के लुटेरे निवासियों के डिनर और खाने का बिल....।

Thursday, July 1, 2010

ख्वाब हूं कि एक ख्वाब में हूं

एक ख्वाब हूं
कि
एक ख्वाब में हूं
झूठ बोलता हुआ
सच हूं
कि
सच बोलता हुआ
झूठ
दुनिया आँखों में है
कि
दुनिया की आंखों में हूं
रास्ते से गुजर रहा हूं
कि
रास्ता मुझ से गुजर रहा है
मै किसी को समझ रहा हूं
कि
मुझे समझा रहा है कोई

Friday, June 25, 2010

मेरे पास एक जनम था, चुनना था कई जनमों को

इसी जनम में मुझे जीना था
सच
कई जनमों का,
इसी जनम में मुझे
बोलना सुनना था
झूठ
सातों दुनिया का,
बनाने थे रिश्ते सात जनमों के
भोगने थे
पाप
कितने जनमों के
कमाना था
पुण्य
अगले जनमों का
इतना ही नहीं
जान लेना था
इस दुनिया को
भूल जाना था पुरानी दुनिया को
मेरे पास एक जनम था
उम्मीद थीं कई जनमों की
मुझे दोहराना था
शैतान से
हजारों जनमों की लड़ाई को
मुझे गाना था
अजनमा
ईश्वर की असीम बड़ाई को,
मेरे पास एक जनम था
चुनना था कई जनमों को
फिर
मैंने तुम को चुन लिया
बाकी
सब
छोड़ दिया
मैंने
अगले जनमों के लिये।

Sunday, June 20, 2010

बड़े बेशर्म हो नीतिश ?........राजा नहीं सेवक हो बिहार के

यूं तो किसी राजनेता पर लिखने का अब कोई मन नहीं होता है। जातिय गोलबंदी के नेता। उनके पास अपना कुछ नहीं है सिर्फ जाति के। ना कोई सपना ना कोई ईमानदारी का विकल्प। सबके पास है सिर्फ जातिय गणित के दम पर की गयी घेराबंदी। कभी एक कबीले का नेता दूसरे कबीले से मिलकर सामंजस्य बैठा लेता है। कभी किसी दूसरे को अपने मुताबिक कर लेता है। और लोकतंत्र और भीड़तंत्र में अंतर कर पाने में नाकाम रही जनता सिर्फ नेता की जाति को ही महत्व देती उसके चरित्र को नहीं। मीडिया हर सत्तारूढ़ नेता को महान साबित करने की होड़ में रहता है बस अनुपात इतना रखता है जितना वो टुकडे़ फेंकता है।
नीतिश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री है। खुद्दार मुख्यमंत्री। इतना खुद्दार कि उसने दो साल पहले बिहार में आयी बाढ़ के दौरान गुजरात राज्य की दी गयी सहायता के पांच करोड़ रूपये वापस कर दिये। इस खुद्दार नेता ने तर्क दिया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राज्य की दी गयी सहायता का गुनगान कर बिहार को अपमानित किया है। एक और बात कि बीजेपी के पटना अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी का नीतिश कुमार के साथ हाथ मिलाते हुए फोटों भी लगाया गया। इस बात पर भड़क गये है नीतिश कुमार।
गजब की खुद्दारी है। बीजेपी के समर्थन से सरकार चला रहे हो। उसकी सरकार में केन्द्र में मंत्री रहे हो। लेकिन हाथ मिलाने के फोटों से खफा। ऐसे ही है जैसे एक बाप घर में बैठ कर चोर बेटे की कमाई पर ऐश कर रहा हो। लेकिन बाहर उस पर नाराज होता रहे। ये कैसी खुद्दारी है। लेकिन नीतिश के जातिय बंधुओँ की निगाह में ये उनके नेता की महानता है। गुड़ खाये और गुलगुलों से परहेज। लेकिन नीतिश की जातिय समीकरण में राजनीतिक लाभ कमा रहे लोगों को अपने नेता की अदा दिखेंगी।
देश के तमाम लोगों की नजर में मोदी खलनायक हो सकते है। ऐसे खलनायक जिसने अल्पसंख्यकों के सफाये की कोशिश की। लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी बात के मुताबिक गुजराती लोगों ने नरेन्द्र मोदी को उससे बेहतर तरीके से चुना है उसी तरह से जिस तरह से नीतिश कुमार को उनके राज्य के लोगों ने। अपन दोनों नेताओं के राजनीतिक विचारों से कोई ईत्तफाक नहीं रखते है। लेकिन लोकतंत्र की कसौटी वोट के दम पर दोनों चुने गये है। यहां तक तो ठीक है। लेकिन क्या नरेन्द्र मोदी ने पांच करो़ड़ रूपये अपनी जेंब से दिये थे। क्या पांच करोड़ रूपया मोदी का था। क्या हर गुजराती मोदी की तरह से नीतिश कुमार का दुश्मन है। ऐसा दुश्मन जिसकी रोटी से अपना पेट पाल रहे हो नीतिश कुमार। लेकिन ये बात मुझे नहीं झकझोरती। बात में हैरानी तब होती है जब आम जनता जिसके दम पर ये नेता जिन्हें नौकर होना चाहिये मालिक बन बैठते है। नीतिश कुमार अगर बिहार के स्वाभिमान की चिंता करते है तो दिल्ली में रोजगार से रोटी चला रहे लाखों बिहारियों को वापस बुला क्यों नहीं लेते। क्योंकि कई बार दिल्ली में उन लोगों को गाली देकर अपमानित किया जाता है।
पैसा मोदी का नहीं था। पैसा नीतिश कुमार को नहीं दिया गया था। पैसा हिंदुस्तान के एक राज्य के लोगों के टैक्स से जमा किया गया था। वो पैसा देश के ही एक राज्य बिहार के लोगों को संकट में मदद के तौर पर दिया गया था। लेकिन नीतिश का स्वाभिमान आहत हो गया। भीख के तौर पर मिली सत्ता की रोटियां तोड़ते वक्त नीतिश को शर्म नहीं आ रही है। लेकिन हाथ मिलते हुए देख कर तिलमिला उठा हूं। आखिर ये हो क्या रहा है संघीय ढ़ांचे की ऐसी की तैसी कर रहे है नेता। लेकिन संविधान में इस बात पर कोई रोकथाम नहीं कि भाई आप नेता है सम्राट नहीं कि आपकी सनक से शासन के नियम तय होंगे। जिस सनक और हनक के साथ नरेन्द्र मोदी जनता के वोटों से चुनकर आयी सोनिया गांधी को रोम की बेटी और जाने क्या क्या कहते है उसी तरह से नीतिश कुमार अपनी हनक और सनक से एक राज्य के लोगों की मदद को वापस कर उन करोडो़ं लोगों का अपमान करते है।
दरअसल इस संविधान को बनाते वक्त नहीं सोचा गया था कि बौने लोग ऊंची गद्दी पर बैठने के लिये हील के जूते नहीं बल्कि दूसरों की गर्दन काट लेंगे। इसी लिये नीतिश ने अपनी सनक में पैसे तो वापस कर दिये लेकिन बीजेपी के समर्थन को वापस नहीं किया। बेशर्मी देखिये बीजेपी की भी वो कह रही है कि वो नीतिश कुमार को समर्थऩ देती रहेंगी। सत्ता की मलाई खाने के लिये बेशर्म बनने में कोई बुराई नहीं है और नूरा कुश्ती से जातिय कबीलों को अपने नेताओँ के हक में बोलने की छूट मिलती है।

Saturday, June 19, 2010

आंखों से बहता क्यूं नहीं.....

आंखों में कुछ जुबां से कुछ
दिल में जो वो कहता क्यूं नहीं
टूट-टूट कर बिखर रहा है अंदर
आंखों से बहता क्यूं नहीं
सफऱ दर सफर घूमता दर दर
जिसे मंजिल कहता है उन आंखों में रहता क्यूं नहीं
आंखों का फरेब है जितना दिलकश
जुबां का सच उतना दिलफरेब क्यूं नहीं

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राख है अभी, कुछ देर में बिखर जायेगी
एक जले हुए ख्वाब की तुमको याद तो आयेगी
देखा, रूकी, मुस्कुराई ,चली जायेगी
जिंदगी कहां देर तलक किसी को मनायेंगी
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टूटी हुई ही सही आस रहनी रहनी चाहिये
भरे गले में भी एक प्यास रहनी चाहिये।

दिल्ली के भेड़िये....

इस
खबर का क्या करूं। अखबार में छोटी सी छपी। दिमाग पर बड़े से हथौड़े की तरह से बज रही है। ध्यान हटाना चाहता हूं लेकिन हट नहीं रहा है। और भी अखबार है जिनमें चमकते हुए फोटो छपी हुईं हैं रगींन। लेकिन दिमाग है कि सौं शब्दों में समेटी गयी खबर से हटता ही नहीं। क्रूरता की मिसाल देने के लिये आप के दिमाग में बहुत सी मिसालें होंगीं। भोपाल छोड़ भी दें तो आपके दिमाग में बसी फिल्मों में फिल्माई गयी सारी निर्दयता भी इस खबर के सामने बौनी लग रही है। खबर..... दिल्ली की एक सड़क पर पुलिस को लाश के छोटे-छोटे टुकडे़ बीनने पड़े।....... एक्टीडेंट में घायल इस आदमी को कारो में गुजर रहे लोगों ने मदद नहीं दी बल्कि उसके उपर से कार के पहिये उतार दिये। कारों की रफ्तार इतनी तेज थी कि एक जिंदा इंसान पहले तो घायल फिर लाश और फिर टुकड़ों में तब्दील हो गया। सड़क पर इंसानी जिस्म के टुकड़े इधर से उधर फैल गये। खून सड़क से उठकर कारों के पहिये से लग कर कार वालों के साथ ही चला गया। खबर को सोच कर किसी भी इंसान के रोंगटें खड़े हो सकते है। अफसोस है कि ये पहला मामला नहीं है दिल्ली में कुछ दिन पहले ही अक्षर धाम टैंपल के सामने वाली सड़क पर इसी तरह से एक इंसान के टुकड़ें दिल्ली पुलिस ने उठाये थे। सवाल ये बचा ही नहीं कि किस गाड़ी की टक्कर से मरने वाला घायल हुआ। सवाल ये है कि हजारों कारें एक इंसान को रौंदते हुए गुजरती जा रही है बिना किसी अफसोस के। कारों में सवार ज्यादातर लोग घर वापस लौट रहे होंगे। घर जिसके अंदर उनके अपने इंतजार कर रहे होंगे। अक्सर आपने देखा होगा कई बार सड़क के बीच में किसी जानवर की लाश पड़ी होती है। पहले उस लाश के आस-पास मांस और खून का कीचड़ होता है। अगले दिन आपको सिर्फ उसकी खाल दिखाई देती है। इस तरह से जमीन से चिपकी हुई जैसे कि किसी ने सड़क पर तस्वीर बना दी हो। और फिर वो भी गायब हो जाती है। लेकिन इस तरह के आम दृश्यों में भी आप ऐसी किसी चीज की कल्पना नहीं कर सकते है कि कोई इंसान इस तरह से कुचल कर गायब होगा। ये देश की राजधानी दिल्ली है। देश के शंहशाहों का शहर। शहर जिसको खूबसूरत बनाने में हजारों करोड़ रूपये लगाये जा रहे है। ये शहर जिसमें कानून बनानी वाली संसद है। तब ये शहर इतना बेदर्द क्यों है। इसका जवाब भी दिल्ली के बाशिंदों में ही छिपा हुआ है। 15000 करोड़ रूपये खर्च कर विदेशी मेहमानों के लिये दुल्हन की तरह से सज रही है दिल्ली। लेकिन इसके लिये सबसे पहली बलि दी गयी उस गरीब आदमी और सड़क पर लेटे हुए आदमी जिसके नारों से दिल्ली की गद्दी सजती रही है। लेकिन हजारों करोड़ रूपये के इस नाजायज खर्च को राष्ट्रीय सम्मान का नाम दिया जा रहा है। इस शहर में पानी बिकता है। इस शहर में पेशाब करने का पैसा लगता है। इस शहर में भीड़-भरे इलाके में चाकूओं से गोद दिया जाता है इंसान को। इस शहर में पुलिस वाले दिन-दहाड़े रेप करने के आरोपों से घिर जाते है। लेकिन शहर है कि जागता ही नहीं।
कुछ दिन पहले देश की राजधानी मान कर हजारों लोग इस शहर में चले आये थे अपना विरोध जताने। दिल्ली शहर के मीडिया ने जिसे राष्ट्रीय मीडिया कहा जाता है पूरे अखबार के पन्ने और टीवी प्रोग्राम्स सिर्फ किसानों के खिलाफ गालियों से भरे थे। एक राष्ट्रीय अखबार में तो बाकायदा कुछ शराब की बोतलें एक साथ इकट्ठा कर खींचे गये फोटों को ये कह कर दिखाया गया कि शराब पी रैली में आने वाले किसानों ने। ठीक है शहर के शराब के ठेके का किसानों के दम पर चलते है। फाईव स्टार होटल्स और हाल ही में माल्स में दी गयी शराब परोसने की छूट का फायदा क्या किसानों को मिलता है। भालू-बंदरों सा दर्शाया था मीडिया ने उन किसानों को जो सिर्फ दिल्ली वालों को परेशान करने ही आये थे। ऐसा ही है ये शहर। ये अलग बात है कि इस शहर का दिल कहलाये जाने वाले कनॉट प्लेस की साज-सज्जा का खर्चा आम आदमी के पैसे से जा रहा है। उस आदमी के जो अपने खून पसीने को बेच कर इस दिल में बहने वाले खून का इंतजाम कर रहा है। लेकिन शहर है कि उन आदमियों को गंदगी कह रहा है। शहर में बहुत सारी बातें है जो राष्ट्रीय मीडिया के पहले पन्ने पर छपती है जैसे कि दरियागंज में एक बस में दो भाईयों को चाकूओं से मार कर गुंड़ों ने लूट लिया। वो चिल्लाते रहे लेकिन किसी ने उनको बचाने की कोशिश ही नहीं की। इसके बाद जब ड्राईवर बस को थाने में ले जाने लगा तो उन दिल्ली वालों ने ड्राईवर को गाली-गलौज कर बस को रुकवाया और उतर कर चलते बने। ये जाने क्यों इस शहर की फितरत है। कभी रोम के बारे में लिखते हुए विश्व कवि नाजिम हिकमत ने कहा था कि
" इस शहर को तो ऐसा ही होना था...क्योंकि इस शहर की नींव में भेडियों का दूध और भाई का खून......। लेकिन हमको इतिहास की किताबों में सिर्फ ये तलाशना है कि क्या किसी पीर, मुर्शीद , औलिया या साधुःसंत ने इस शहर को ऐसा होने का शाप दिया था क्या।

Sunday, June 13, 2010

भोपाल..... देश की नौजवानी पर शर्मिंदा है

अदालत का फैसला आ गया।
25 हजार इंसानों की हत्याओं के दोषियों को 2 साल की कैद और दस मिनट में जमानत मिल गयी। बाहर चींखतें हुए इंसानों की तस्वींरें टीवी चैनल्स पर दिखती रही। अगले दिन के अखबारों में छप गया वो फोटो एक बेहद मासूम सी बच्ची को दफनाते वक्त का। फैसला आया तो कुछ सूझा ही नहीं। दर्द और अपमान के अलावा कोई दूसरी भावना दिमाग में नहीं थीं। लिख नहीं पाया। पुराने सारे मंजर और तस्वीरें एक एक कर टीवी चैनल्स दिखा रहे थे। फैसले की बार-बार हवा में तैरती आवाज दिल को तोड़ रही थी। देश के कानून मंत्री ने कहा कि न्याय को दफन कर दिया गया। किसने ...। अदालत ने, देश के कानून ने, नेताओं ने या खुद जनता ने ये सवाल हवा में गूंज रहा है। लेकिन मुझे इसको लेकर कोई अफसोस नहीं कि ये सब झूठ बोल रहे है। पूरा देश पिछले साठ सालों से इसी तरह से चलाया जा रहा है। जातियों के दम पर टके के नेता चुन कर संसद और विधानसभाओं में पहुंच कर कानून बनाने में जुटे हैं। कौन सा कानून वहीं जो अमीरजादों और ताकतवर लोगों के हक में काम करता रहे। लेकिन ये मरे हुए मन का रूदन है। पुराना पाठ है।
जब हजारों लोग मारे गये। किसी ने तो लापरवाही की होंगी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का फैसला रहा होंगा। लेकिन किसी को क्या फर्क पड़ता है। केन्द्र हो या राज्य दोनों में दूसरी पार्टियों की सरकारों ने भी राज किया है इस पच्चीस सालों के बीच। लेकिन किसी को को वास्ता नहीं था। सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्यायधीशों को इस बात का याद रहता है कि आरटीआई के माध्यम से सूचना देना सुप्रीम कोर्ट के विशेषाधिकारों का हनन है। बेस्ट बेकरी केस जहीरा शेख का मामला हो या फिर गुजरात में अहसान जाफरी गुलबर्गा सोसायटी का मामला हो सब में नयी परंपरा डाली जा सकती है लेकिन पच्चीस हजार लोगों की अकाल मौत पर नहीं। अगर आप देश को और करीब से समझना चाहते है तो सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सरकार की ओर से और कंपनी की ओर से खड़े वकीलों की फेहरिस्त देख लेंगे तो समझ लेंगें कि क्यों दोगलापन इस देश की रगो में दौड़ रहा है।
आज इस लिये कोई निराशा नहीं है कि ये सब चल रहा है। आज दिल मुठ्ठी में बंद सा लग रहा है तो इस लिये कि देश की जवानी के उपर इस फैसले का कोई फर्क नहीं पड़ा।
देश का भविष्य जो जेसिका लाल को इंसाफ न मिलने पर मोमबत्ती जलाता है तो कोई निरूपमा के कत्ल पर आंसू बहाता है। वो नौजवान चुप है। वो देश का मुस्तकबिल चुप है जिस पर देश की जिम्मेदारी आने वाली है। क्रिकेट के स्टेडियम में तिरंगे को लहराने वाला अपने सर औऱ चेहरे पर तिरंगा बनवाने वालों की जवानी है ये। मौका मिलते ही अमेरिका निकलने की छटपटाहट के साथ जिंदा इन देशभक्त नौजवानों पर देश निसार है। ये नये प्रतिमान गढ़ रहे है। बिना किसी इतिहास बोध के चलती हुई एक पूरी सदी। और आपके पास इस बात का कोई रास्ता नहीं कि अपना गुस्सा कैसे उतारे। ये लोग आसानी से तिरंगा लहरा सकते है दूसरे हाथ से अमेरिका या फिर किसी भी यूरोपिय देश में जाने के लिये रिश्वत दे सकते है। दरअसल देश के लिये नारा लगाने वाले इस जवानी के लिये अमेरिका माई -बाप है। उसकी कल्चर इसका सपना है उसके शहरों में खरीददारी करना सबसे बेहतर लाईफ स्टाईल। ये नौजवान उन रोटियों के लिये जूझते हिेंदुस्तान की लड़ाई लड़ेगे। ये वो नौजवान है जिनकी याद में आजादी की लड़ाई पुरानी बात है। जिनके लिये आउट्रम लेन,हडसन लेन और नील लेन में रहना तैयारी के लिहाज से अच्छा है। किसी को नहीं चुभता कि हडसन और नील ने हजारों हिंदुस्तानियों को मौत के घाट उतार दिया था निर्दयता पूर्वक। औरतों के साथ बलात्कार हुए बच्चियों को कुचल दिया गया बच्चों को नेजों की नोंकों पर उछाल कर बींद दिया गया। लेकिन ये नाम किसी को नहीं चुभते। दिल्ली के पॉश इलाके में शुमार होते है ये इलाके।
विदेश जाने की चाहत कितनी है इसका अंदाज सिर्फ इस बात से लगा सकते है कि पंजाब में कई ऐसे मामले रिपोर्ट हुए है जिनमें बहन अपने सगे भाई के साथ या बाप अपनी बेटी के साथ मां बेटों के साथ शादी के फर्जी दस्तावेज तैयार कर कर बाहर निकले है। ऐसे ही लोगों के दम पर टिकी है इस देश की देशभक्ति।
लेकिन देशभक्ति से उलट एक बात पर इन लोगों को जरूर ध्यान देना चाहिये कि न्यूक्लियर प्लांट से हुई एक भी चूक हजारों इंसानों का नहीं बल्कि लाखों इंसानों को मौत के घाट उतार देंगी। और तब भी इसी तरह से होना है इस बार 800 करोड़ रूपये मिल गये है लेकिन अगली बार पांच सौ करोड़ रूपये मिलेंगे। हां एक बात और मौत के घाट उतरने वाले भी इस बार वहीं भूखें-नंगें होंगे जिनकी वोट के दम पर नाच रहे कबीलाई नेता संसद में बैठ कर कानून बना रहे है और अमेरिका के तलवे चाट रहे है।
बात खत्म नहीं हो रही है लेकिन मैं कुछ शब्द उधार लेकर खत्म करना चाहता हूं
" सिलेटी बुदबुदाते हुए चेहरों की कतारें, भय का नकाब ओढ़े खाई की गहराई से उठकर ऊपर तक आती हैं, उनकी कलाईयों पर व्यस्त समय अकारण टिक्-टिक् करता और उम्मीद, जलती हुई आँखों, कसमसाती मुट्ठियों के साथ कीचड़ में लोट पोट --हे ईश्वर, यह सब बंद करो|"

Friday, June 11, 2010

मैं पत्थर पर यकीं कर रहा हूं आदतन

मैं पत्थर पर यकीं कर रहा हूं आदतन
वो खुद को तेज कर रहा है इरादतन
मुझे यकीन हैं बदल दूंगा उसकी फितरत
वो मुत्मईन है तोड़ देगा मेरी हसरत
मेरा वजूद मेरे हौंसले में हैं
उसकी हस्ती तोड़ने में है
मेरे ईरादों की गर्मी से ये पिघल जायेगा
उसकी सोच का ठंडापन ये भी गुजर जायेगा
चाहता हूं कि कुछ देर वो सीने से लगे अपना हो ले
उसका इंतजार हो खत्म मुलाकात और ये भी रो ले

चेहरा बदलते हुए अंधा हो जाता हूं, मैं

एक चेहरे से पाया मैंने,
एक चेहरे से खो दिया,
यही दर्द है,
चेहरे बदलने का।
दर्प से उल्लसित,
विजयी चेहरे के साथ,
मिलता हूं दुनिया से,
मैं,
पराजित चेहरे में,
नितांत अकेला, निराश,
दर्पण के साथ,
इन्हीं में से किसी चेहरे से,
जुड़ गयी थी,
तुम
तु्म्हें याद है अब तक वो चेहरा,
मैं भूल भी गया वो चेहरा,
तुम रोज मुझ में तलाशती हो उसी आवाज को,
मैं गफलत में चेहरे बदलता हूं जल्दी जल्दी,
लेकिन खोज नहीं पा रहा उसी चेहरे को,
काम निकला और चेहरा गायब,
यहीं उसूल है ज्यादातर चेहरों को लगाने का,
तुम मेरे करीब आयी,
मेरे चेहरे ने पा लिया वो,
जिसके लिये बना था वो
फिर बदल गया दुनिया के लिये,
चेहरा बदलते हुए अंधा हो जाता हूं,
मैं,
केंचुली बदलते हुए,
सांप,
कैसे याद करूं,
मैं,
अपने खोये हुए चेहरे को,
लेकिन,
सोचना जरूर कभी,
कहां से सीखा
मैंने
चेहरे बदलना।

Monday, June 7, 2010

देश के आम आदमी का मैन्यू क्या है प्रधानमंत्री जी

"देश के लिये आज का दिन सौभाग्य का दिन है, देश को एक बेहद ईमानदार और पढ़ा लिखा प्रधानमंत्री मिला है" कॉफी हाउस में बैठते हुए एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने मुझसे कहा था। देश की कमोबेश यही हालत थी। वर्ल्ड बैंक के लिये नौकरी कर चुके प्रधानमंत्री की ईमानदारी और अर्थशास्त्र की समझ पर कांग्रेसियों और बाकी पूरे देश को ऐतबार दिख रहा था।
वर्ल्ड बैंक की नौकरी यानि अमेरिकी और ताकतवर अमीर देशों के इशारों पर काम करने वाला बैंक। मैंने बस इतना सा ही जवाब दिया था। उन लोगों का मजा किरकिरा नहीं करना चाहता था। पत्रकार होने के नाते मेरे जेहन में ऐसे सवाल जरूर चुभ रहे थे। मैं चाहता तो भी मेरे दोस्त उनका जवाब नहीं दे पातें। हालांकि मैंने चलते-चलते पूछ लिया कि ये प्रधानमंत्री हिंदी में अच्छा बोलतें है कि पंजाबी में। जवाब में अटकते कांग्रेसी दोस्तों ने कहा कि नहीं वो इन दोनों भाषाओं में नहीं बल्कि अंग्रेजी में बहुत शानदार बोलते है। मुझे लगा कि देश के लिये ये प्रधानमंत्री कितने मुफीद होंगे साफ नहीं था लेकिन एक बात थी कि ये जनाब अर्थशास्त्र के भारी विद्धान है
बात आई-गई हो गयी। वो कांग्रेसी दोस्त भी मेरे साथ है। कभी-कभी मिलते है। देश के सामने भी प्रधानमंत्री का काम-काज है। चौबीस मई को छह साल के अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने दूसरी बार प्रेस कांफ्रेस की। यानि देश से दूसरी बार प्रधानमंत्री मुखातिब हुए। उनकी पहली बात थी कि देश तरक्की कर रहा है। पूरी प्रेस कांफ्रेस के फूटेज को बार-बार देखता हूं, उसको पढ़ता हूं एक बात समझ में आती है कि ये वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री है किसी गरीब जनता के प्रतिनिधि नहीं। गरीब देश की अमीर संसद के प्रधानमंत्री। तीन सौ से ज्यादा करोड़पति सांसद है इस बार की कुल पांच सौ पैतालिस की संसद में। ये कैसा अर्थशास्त्र है कि गरीब आदमी रोटी के लिये तड़प रहा है। गरीब आदमी आम आदमी नहीं है इस देश में। आम आदमी देश के मध्यमवर्ग को कहा जाता है। वो वर्ग भी मंहगाई से बिलबिला रहा है। देश की 38 फीसदी जनता को एक वक्त का खाना नहीं मिल रहा है। बच्चे मिट्टी की रोटियां खा रहे है। परिवार आत्महत्या कर रहे है। कुपोषण का कोई आंकड़ा नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री का चेहरा खुशी से दमक रहा था और उनके मुंह से देश को पता चल रहा था कि बढ़ती विकास दर से मंहगाईं बढ़ रही है। मुझे सिर्फ एक हिंदुस्तानी अर्थशास्त्री की बात याद आ रही थी कि वर्ल्ड बैंक गरीब आदमी के निवाले से अमीरों की थाली सजाता है।
ये सोचा जा सकता है कि गरीबी पर नियंत्रण तो प्रधानमंत्री के हाथ से बाहर की बात है। लेकिन मंत्रीमंडल में मक्कारों की फौज पर प्रधानमंत्री का कोई बस है कि नहीं। उनको कोई घोटाला समझ आता है कि नहीं। टेलीकॉम घोटाला 60,000 करोड़ रूपये की देश के साथ लूट। एक के बाद एक घोटाले लेकिन प्रधानमंत्री का कहना है कि जांच होंगी। लेकिन जांच किस बात की होंगी..सबूतों से तो साफ दिख रहा है कि इसमें देश के साथ लूट हुई लेकिन ये अर्थशास्त्री समझ नहीं पा रहे है।
शरद पवार का कुनबा लूट की छूट के साथ ही मंत्रीमंडल में शामिल हुआ। संसद के गलियारे में शरद पवार की सांसद बेटी देश के सामने सफेद झूठ बोलती है कि उसके परिवार का कोई लेना-देना इंडियन पैसा लूटो लीग से नहीं है माफ करना इंडियन प्रीमियर लीग मैं चाह कर भी नहीं कह पाता हूं।
पहले पता चलता है कि सुप्रिया सुले के पति के उस कंपनी में शामिल है जिसको प्रसारण अधिकार के हजारों करो़ड़ के ठेके मिले है। खुदा खैर करे ...लेकिन अब सामने आया कि पुणे टीम की खरीद में शामिल सिटी कॉर्प के पीछे शरद पवार का परिवार है। खुद शरद पवार उनकी पत्नी और बेटी की इस कंपनी में 16 फीसदी हिस्सेदारी है। कंपनी ने पुणे की टीम खरीदने की 1100 करोड़ की बोली लगाई थी। कोई बेवकूफ भी बता सकता है कि कैसे ये खेल हुआ होंगा। लूट में जुटे इस परिवार के करीबी और इंटेलीजेंट और ओनेस्ट प्रधानमंत्री के एक और मंत्री प्रफुल्ल पटेल की बेटी ललित मोदी के लिये काम कर रही है।
दाल घोटाले में हजारों करोड़ रूपये का खेल कैसे हुआ। चीनी घोटाला क्या है। लोग भूल जाते हैं। इस भूल की कीमत बैठती है पवार कुनबे के दम पर जम कर देश को लूट रहे बिजनेस समूहों के लिये हजारों करोड़ रूपये की छप्परफाड़ कमाईं। देश के सामने शरदपवार झूठ बोलते है कि चीनी का उत्पादन कम होने की उम्मीद है मंहगाईं बढ़ती है 14 रूपये किलो चीनी 50 रूपये किलो तक जाती है। और देश में चीनी का उत्पादन ज्यादा हो जाता है। कैसे... ज्योतिषी जानता है प्रधानमंत्री नहीं।
हैरानी और भी है। लेकिन किसी को मालूम नहीं कि प्रधानमंत्री देश से बात करते हुए किस बात पर ज्यादा खुश है कि छह साल तक गद्दी पर बैठे रहे या देश के युवराज की अभी गद्दी संभालने की इच्छा नहीं है।
लेकिन एक बात और देश के प्रधानमंत्री की सभा में मीडिया की दरियादिली देखिये कि पूछता है कि आप किसकी ज्यादा सुनते है अपनी पत्नी की या अपनी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी की। मुस्कुराते प्रधानमंत्री और अपने सवाल पर इतराता मीडिया गजब की नूरा कुश्ती है।
लेकिन सवाल है अर्थशास्त्री जी देश के गरीब आदमी को कितनी रोटी खानी चाहिये और आम आदमी के एक दिन की थाली का मैन्यू क्या हो।